
▪️सूर्यकांत उपाध्याय
एक बार महर्षि नारद ज्ञान का प्रचार करते हुए एक सघन वन में जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने घनी छाया वाला एक विशाल सेमर का वृक्ष देखा। उसकी शीतल छाया में विश्राम करने के लिए वे वहीं ठहर गए।
नारदजी को उसकी शीतल छाया में विश्राम करके बड़ा आनंद हुआ। वे उसके वैभव की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। उन्होंने उससे पूछा, “वृक्षराज! तुम्हारा इतना बड़ा वैभव किस प्रकार सुरक्षित और स्थिर रहता है? प्रबल पवन भी तुम्हें गिरा क्यों नहीं पाती?”
सेमर के वृक्ष ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “भगवन्! बेचारे पवन की इतनी सामर्थ्य कहाँ कि वह मेरा बाल भी बाँका कर सके। वह मुझे किसी भी प्रकार गिरा नहीं सकती।”
नारदजी को लगा कि सेमर का वृक्ष अभिमानवश ऐसे वचन बोल रहा है। उन्हें यह उचित नहीं लगा और वे झुँझलाते हुए देवलोक चले गए।
देवलोक पहुँचकर नारदजी ने पवनदेव से कहा, “अमुक वृक्ष अभिमानपूर्वक दर्पभरे वचन बोलते हुए आपकी निंदा करता है। उसका अभिमान दूर करना चाहिए।”
अपनी निंदा सुनकर पवनदेव को बहुत क्रोध आया। वे उस वृक्ष को उखाड़ फेंकने के लिए प्रचंड वेग से आँधी-तूफान की तरह चल पड़े।
सेमर का वृक्ष बड़ा तपस्वी, परोपकारी और ज्ञानी था। उसे आने वाले संकट का पूर्वाभास हो गया। उसने तत्काल अपने बचाव का उपाय कर लिया। उसने अपने सारे पत्ते झाड़ दिए और ठूँठ की भाँति खड़ा हो गया। पवनदेव आए और उन्होंने उसे उखाड़ने का भरसक प्रयास किया, किंतु ठूँठ का कुछ भी बिगाड़ न सके। अंततः उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा।
कुछ दिन पश्चात् नारदजी उस वृक्ष का हाल देखने के लिए पुनः उसी वन में पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि वृक्ष फिर से ज्यों का त्यों हरा-भरा खड़ा है। यह देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।
उन्होंने सेमर से पूछा, “पवनदेव ने पूरी शक्ति से तुम्हें उखाड़ने का प्रयास किया था, फिर भी तुम आज तक ज्यों के त्यों खड़े हो। इसका क्या रहस्य है?”
वृक्ष ने नारदजी को प्रणाम करते हुए विनम्रतापूर्वक कहा, “ऋषिराज! मेरे पास इतना वैभव अवश्य है, पर मैं उसके मोह में बँधा नहीं हूँ। संसार की सेवा के लिए मैं इन पत्तों को धारण करता हूँ, किंतु जब आवश्यकता होती है, तब बिना किसी हिचकिचाहट के उनका त्याग कर ठूँठ बन जाता हूँ। मुझे अपने वैभव का नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसे त्याग देने की सामर्थ्य का विश्वास था। इसी कारण मैंने पवन की अपेक्षा स्वयं को अधिक समर्थ कहा था। आप देख ही रहे हैं कि इसी निर्लिप्त कर्मयोग के कारण मैं पवन की प्रचंड टक्कर सहकर भी आज यथापूर्व खड़ा हूँ।”
नारदजी समझ गए कि संसार में वैभव या धन-संपत्ति होना कोई बुरी बात नहीं है। उसके माध्यम से अनेक शुभ कार्य किए जा सकते हैं। बुराई तो धन के अभिमान और उसके मोह में डूब जाने में है।
यदि कोई व्यक्ति धनवान होते हुए भी मन से पवित्र और निर्लिप्त रहे, तो वह एक प्रकार का साधु ही है। ऐसे कर्मयोगी के लिए, जो जल में कमल की भाँति संसार में रहते हुए भी उससे आसक्त नहीं होता, उसका घर ही तपोभूमि बन जाता है।
