▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार कबीर जी ने एक साहूकार से 100 रुपए उधार लिए और साधु-संतों की सेवा में खर्च कर दिए। उन्होंने वादा किया कि कुछ महीनों बाद सूद समेत रुपए लौटा देंगे। समय बीत गया, लेकिन वे रुपए नहीं चुका सके।
साहूकार ने काजी की कचहरी में अर्जी देकर कुर्की का आदेश ले लिया। एक भक्त ने कबीर जी को यह बात बताई तो वे चिंतित हुए। उन्होंने पत्नी लोई जी से कहा, ‘घर का सारा सामान पड़ोसियों के यहाँ रख दो, ताकि साहूकार उसे कुर्क न कर सके। मैं कुछ दिनों के लिए कहीं चला जाता हूँ। रुपए होने पर साहूकार को चुका दूँगा।’
लोई जी ने दृढ़ विश्वास से कहा, ‘स्वामी! मुझे पूरा भरोसा है कि राम जी अपने भक्त की कुर्की नहीं होने देंगे। आपको कहीं जाने की जरूरत नहीं है।’
कबीर जी मुस्कराकर बोले, ‘लोई! यही तो तेरा गुरु रूप है।’
रात हो गई। कबीर जी ने फिर कहा कि सुबह साहूकार प्यादों के साथ आ सकता है। लोई जी बोलीं, ‘राम जी उसे हमारे घर आने ही नहीं देंगे। जब हम उनके हो गए हैं तो हमारे काम वे नहीं करेंगे तो कौन करेगा?’
तभी दरवाजा खटखटाया। सामने साहूकार का मुंशी था। लोई जी ने पूछा, ‘क्या हमारी कुर्की करने आए हो?’ मुंशी ने कहा, ‘नहीं माता जी।’
उसने बताया, ‘कल कचहरी में एक सुंदर मुखड़े और रेशमी वस्त्रों वाले सेठ आए। उन्होंने पूछा कि कबीर जी से कितने रुपए लेने हैं। साहूकार ने 100 रुपए और 30 रुपए ब्याज बताया। सेठ ने पाँच सौ रुपए की थैली देते हुए कहा कि इसमें कबीर जी के रुपए हैं, जो वर्षों से हमारे पास अमानत के रूप में रखे हैं। जितने तुम्हारे हैं ले लो और बाकी रुपए कबीर जी के घर पहुँचा दो।’
मुंशी ने कहा कि वह सेठ अचानक गायब हो गए। इस घटना से साहूकार को विश्वास हो गया कि कबीर जी ईश्वर के भक्त हैं। उसने शेष रुपए भी धर्म के काम में लगाने और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी।
लोई जी ने थैली कबीर जी को उठाने को कहा। कबीर जी मुस्कराकर बोले, ‘इस बार राम जी ने तेरे विश्वास के अनुसार काम किया है, इसलिए थैली तू ही उठा।’
लोई जी बोलीं, ‘राम जी हम दोनों के साँझे हैं, इसलिए मिलकर उठाते हैं।’
दोनों ने राम का गुणगान करते हुए थैली अंदर रखी और उसी दिन कबीर जी के घर एक बड़ा भंडारा हुआ, जिसमें पूरी रकम धर्म के काम में खर्च कर दी गई।
