▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

पांच दिन की छुट्टियां बिताकर जब मैं ससुराल पहुंची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे। अंदर गई तो छोटे से गैराज में चमचमाती स्विफ्ट डिजायर खड़ी थी।
मैंने आंखों ही आंखों में सवाल किया तो उन्होंने चाबी थमाते हुए कहा, ‘कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी, प्रोफेसर साहिबा!’
खुशी से मैंने उन्हें गले लगा लिया। छह साल के वैवाहिक जीवन में उन्होंने मुझे न जाने कितने उपहार दिए थे। खुद पुरानी इंडिगो चलाते हैं, लेकिन मेरे लिए महंगी गाड़ी खरीद लाए।
तभी मेरी नजर उस जगह गई, जहां मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।
‘स्कूटी कहां है?’
‘बेच दी। अब गाड़ी मिल गई है तो उसका क्या करना?’
मैं सन्न रह गई। ‘तुमने मुझसे पूछे बिना उसे बेच दिया? वह सिर्फ स्कूटी नहीं थी। वह मेरे पापा की आखिरी निशानी थी। मुझे तुम्हारी गाड़ी नहीं चाहिए।’
मेरी आंखों से आंसू निकल पड़े। सास ने मुझे गले लगाते हुए पति से कहा, ‘मैंने पहले ही कहा था, बहू से पूछ लेना। अब वापस लाओ उसकी स्कूटी।’
पति सिर झुकाकर बोले, ‘सॉरी। मुझे नहीं पता था वह तुम्हारे दिल के इतनी करीब है। कबाड़ी को सिर्फ सात हजार में बेची है। अभी जाकर वापस लाता हूं।’
स्कूटी मेरे लिए इतनी खास क्यों थी?
कॉलेज के दिनों में एक लड़की ने मेरी गरीबी का मजाक उड़ाते हुए कहा था, ‘यह तुम्हारे और तुम्हारे पापा की औकात से बाहर है।’
घर आकर मैंने पापा से पूछा था, ‘पापा, हम गरीब हैं क्या?’
उन्होंने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘हम गरीब नहीं हैं बिटिया, बस हमारा वक्त थोड़ा गरीब चल रहा है।’
अगले दिन पापा मेरे लिए एक प्यारी-सी स्कूटी लेकर आए। वह मेरे सपनों की उड़ान थी। बाद में पता चला कि उसे खरीदने के लिए उन्होंने अपना टेंपो गिरवी रख दिया था। छह महीने तक पैरों से सवारियां ढोते रहे, लेकिन मुझे इसका एहसास तक नहीं होने दिया।
वही स्कूटी मेरे लिए पापा के प्यार, त्याग और आत्मसम्मान की निशानी थी।
अचानक बाहर से फट-फट की आवाज आई। पति मेरी स्कूटी वापस लेकर आ रहे थे। उन्हें देखकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई।
वह मेरे लिए सिर्फ स्कूटी नहीं थी, पापा के प्यार से सींचा हुआ मेरा उड़नखटोला थी।
