▪️पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत
- इस पुस्तक के अनुवादक डॉ. मुख्तार खान तलनीकर ने एकदम सही लिखा है कि ‘समंदर बोलता है’ एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें महाराष्ट्र के समुद्री साहिल पर आबाद कोंकणी मुसलमानों के सामाजिक जीवन को बड़ी खूबसूरती के साथ मंज़र-ए-आम पर लाया गया है। इस उपन्यास का महत्त्व इसलिए भी अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि इस उपन्यास के द्वारा हम पहली बार कोंकणी ग्रामीण मुसलमानों के सामाजिक जीवन, उनकी संस्कृति और जीवन संघर्ष से सीधे रू-ब-रू होते हैं।’

• पूरे महाराष्ट्र में कोंकण की बात ही निराली है। कुदरत ने इसे सब कुछ दिया है। अप्रतिम भौगोलिक संरचना और बेमिसाल सौंदर्य से लबरेज कोंकण के एक ओर समंदर है तो दूसरी ओर लंबे पहाड़। नारियल, कटहल, काजू और सुपारी के साथ यह इलाका विश्व प्रसिद्ध ‘हापुस आम’ के लिए भी मशहूर है। ‘समंदर बोलता है’ की शुरुआत यूं होती है-
‘खामोश अंधेरी रात के सन्नाटे में ठाठें मारता हुआ समंदर शोर बरपा किए हुए था। नवंबर की खनकती सर्द हवा अब उन्हें उठने पर मजबूर कर रही थी। अलाव में जलाए जाने वाले नारियल के सूखे पत्ते और थान का सूखा घास अब खत्म हो चुका था। रात के ग्यारह बजने को थे। ग्यारह बजे सरफराज के घर उसके वालिद इया ‘खोत मरहूम’ (इब्राहिम मुकादम) के ईसाल-ए-सवाब (मुर्दे की रूह को कुरान पढ़ने या खाना खिलाने का सवाब पहुँचाने के लिए) की खातिर मदह-ख्वानी (प्रार्थना सभा) हुई। आज उनके इंतिकाल को एक महीने से कुछ ज्यादा का अर्सा बीत चुका था।’
वकार क़ादरी ने इसी इलाके के निवासी कोंकणी मुसलमानों की जीवनशैली, इबादत के स्थानीय तौर-तरीके, शादी-ब्याह की रस्मों और रिवाजों, युवाओं का रोज़गार की तलाश में मुंबई और देश-विदेश की यात्रा करना तथा विस्थापन से उपजी समस्याओं जैसे सामाजिक मुद्दों को उपन्यास में बड़ी खूबसूरती के साथ बुना है।
यूं तो यह उपन्यास सलीम और सलमा की प्रेम कहानी है, लेकिन इस प्रेम कहानी के जरिए वकार क़ादरी ने एक शताब्दी के समयकाल को समेटते हुए कोंकण के सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं को भी कथानक में शामिल किया है। 1947 का बंटवारा, आजादी, गोवा का मुक्ति संग्राम, 1975 की लड़ाई और मुंबई से जुड़ी घटनाएं भी इसमें हैं-
‘कॉमरेड जब्बार मुंबई की किसी कपड़ा मिल में काम करते थे। यूनियन से जुड़े होने के कारण कॉमरेड कहलाए जाने लगे। धीरे-धीरे गाँव के भी लोगों के लिए वह कॉमरेड जब्बार हो गए। मुंबई की कपड़ा मिलों के मालिक जब जॉर्ज फर्नांडिस और फिर दत्ता सामंत की ट्रेड यूनियनों से तंग आकर गुजरने लगे, तो मुंबई की कपड़ा मिलें बंद होती चली गईं। कॉमरेड भी मुंबई में उन दिनों बेरोज़गार हो गए थे। मुंबई में अपनी तेली मोहल्ले की खोली में ही रहते, वहाँ डी-कंपनी का उरूज हो रहा था। वहीं लगे रहे। माह-दो माह में गाँव का चक्कर लगा आते।’
ऐसे माहौल में नायक और नायिका ‘सलीम’ और ‘सलमा’ की प्रेम कहानी जवान होती है। हालात के चलते सलमा की शरीफ से शादी हो जाती है, लेकिन अंत में सलमा और शरीफ मिलते हैं और दोनों का विवाह होता है। इस दौरान अफजल, सज्जाद, बूढ़ी दादी, बाबा जमालउद्दीन, गाँव के नौजवान आशिकों की आदर्श मुंबईवाली, देसी शराब का ठेका चलाने वाली वरजेश्वरी और बात-बात में ‘धत्त तेरा पाकिस्तान’ कहने वाली देशभक्त खातून की उपस्थिति ‘समंदर बोलता है’ को जीवंत करती है।
• उपन्यास में ‘बूढ़ी दादी’ का चरित्र बड़ा जीवंत है। लेखक और दादी के संवादों में गाँव की संस्कृति, समाज और इतिहास के दर्शन होते हैं। विभाजन की त्रासदी से लेकर ब्रिटिश काल की ऐतिहासिक घटनाओं को दादी ने रोचक किस्सों के माध्यम से अपनी स्मृति में संजोकर रखा है। उपन्यास में गाँवों के मसले हैं, अंधविश्वास हैं तो भाईचारे की खूबसूरती भी है। सलीम को पुल गाँव के नागू अन्ना के यहाँ छुआछूत का अनुभव होता है, तो मराठी हाईस्कूल में उसने इंसानियत का एक अलग रूप भी देखा था, जहाँ दलित, ब्राह्मण और अन्य हिंदू बच्चे मिल-बाँटकर एक-दूसरे के खाने के डिब्बे खाया करते थे।
वकार कादरी माहौल के वर्णन के साथ सूक्ष्म ऑब्जर्वेशन पर खास ध्यान देते हैं-
‘स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस लोनेरे फाटे से राइट मारकर गोरेगाँव और फिर पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर जोशी के गाँव मांडवी, पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के गाँव अंबेत से होती हुई मंडनगढ़ पहुँची।’
इस तरह के जीवंत विवरण का एक और उदाहरण देखिए-
‘हरनई बंदरगाह पर मछेरे अपनी कश्तियों और स्टीमरों से मछलियों से भरे टोकरे उतार लाते हैं और उन्हें अपनी औरतों के हवाले कर देते हैं, जिन्हें बेचने की ज्यादातर जिम्मेदारी उन औरतों की होती है। नीलामी होती है। बोली लगती है। महँगी मछलियों में पॉपलेट, सुरमई, घोल, छोटा झींगा, बड़ा झींगा, लॉबस्टर, हलवा। और सस्ती मछलियों में बोंबिल, मांदले, च्योना, बांगड़े वगैरह। ज्यों ही टोकरे लाकर रखे जाते हैं, खरीदार हैसियत के मुताबिक बोली लगाते हैं। जो सबसे ज्यादा बोली लगाए, गाँठ से रुपया निकालकर अदा करे, मछली का टोकरा उसका। यह ‘पैसा फेंक, तमाशा देख’ वाला मामला है।’
कुल मिलाकर, ‘समंदर बोलता है’ एक अद्भुत उपन्यास है। इसमें स्थानीय बोली-भाषा के शब्दों और मुहावरों का खूबसूरत इस्तेमाल है। रीति-रिवाज और परंपराएं हैं, सांप्रदायिक सौहार्द है। कादरी उर्दू साहित्यकार हैं। मूल रूप से उर्दू में लिखे गए इस उपन्यास का सुंदर अनुवाद करने वाले मुख्तार खान बधाई के पात्र हैं।
लोकमित्र, दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस उपन्यास की पृष्ठ संख्या 132 और मूल्य 295 रुपए है।
