▪️सूर्यकांत उपाध्याय

▪️एकदंत
महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से मद की रचना की। मद को च्यवन का पुत्र माना गया।
मद ने दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली। शुक्राचार्य ने उसे हर तरह की विद्या में निपुण बना दिया। शिक्षा प्राप्त करने के बाद मद ने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया। उसके अत्याचारों से सभी देवता परेशान रहने लगे। मद इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसने भगवान शिव को भी पराजित कर दिया।
तब सभी देवताओं ने मिलकर भगवान गणेश की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर भगवान गणेश एकदंत रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं थीं, एक ही दांत था, पेट बड़ा था और सिर हाथी के समान था। उनके हाथों में पाश, परशु और एक खिला हुआ कमल था।
एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और युद्ध में मदासुर को पराजित कर दिया।
▪️महोदर
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया, तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को तैयार कर देवताओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। मोहासुर के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए देवताओं ने भगवान गणेश की उपासना की।
तब भगवान गणेश ने महोदर अवतार धारण किया। इस रूप में उनका उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर पहुंचे। महोदर के तेज और प्रभाव को देखकर मोहासुर ने बिना युद्ध किए ही उन्हें अपना इष्ट मान लिया।
▪️लंबोदर
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धारण किया, तो भगवान शिव उस रूप पर मोहित हो गए। इसी दौरान उनका शुक्र स्खलित हुआ, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई।
उस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्यदेव की कठोर उपासना की और उनसे पूरे ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने का वरदान मांग लिया। यह वरदान मिलते ही वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया और उसके भय से सभी देवता चिंतित हो उठे।
क्रोधासुर अपने विजय अभियान पर निकल पड़ा। तब भगवान गणेश ने लंबोदर रूप धारण कर उसे रोक लिया। उन्होंने क्रोधासुर को समझाया और उसे यह बोध कराया कि संसार में कोई भी योद्धा सदैव अजेय नहीं रह सकता। गणेश की बात क्रोधासुर को समझ में आ गई। उसने अपना विजय अभियान रोक दिया और सब कुछ छोड़कर पाताल लोक चला गया।
▪️विकट
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। इसके परिणामस्वरूप एक दैत्य उत्पन्न हुआ, जिसका नाम कामासुर था।
कामासुर ने भगवान शिव की कठोर आराधना करके त्रिलोक पर विजय प्राप्त करने का वरदान पा लिया। वरदान मिलते ही उसने भी अन्य दैत्यों की तरह देवताओं पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसके आतंक से परेशान होकर सभी देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया।
तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। इस रूप में वे मोर पर विराजमान होकर प्रकट हुए। उन्होंने देवताओं को अभय का वरदान दिया और युद्ध में कामासुर को पराजित कर दिया।
▪️विघ्नराज
एक बार माता पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थीं। इसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष उत्पन्न हुआ। माता पार्वती ने उसका नाम मम रखा, जिसे ममता भी कहा जाता है।
माता पार्वती से मिलने के बाद वह वन में तप करने चला गया। वहीं उसकी मुलाकात शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियों की शिक्षा दी और मम को भगवान गणेश की उपासना करने के लिए कहा।
मम ने कठोर तप करके गणपति को प्रसन्न किया और उनसे पूरे ब्रह्मांड के राज्य का वरदान मांग लिया। इसके बाद शम्बरासुर ने अपनी पुत्री मोहिनी का विवाह मम से कर दिया।
जब शुक्राचार्य को मम के तप के बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। इसके बाद ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए। उसने सभी देवताओं को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया।
तब देवताओं ने भगवान गणेश की उपासना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर गणेश विघ्नराज के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने ममासुर का मान-मर्दन किया और सभी देवताओं को बंधन से मुक्त कराया।
▪️धूम्रवर्ण
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्यदेव को अपने पद का अभिमान हो गया। तभी उन्हें एक बार छींक आई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम अहम था।
अहम शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें अपना गुरु बना लिया। शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में वही अहम आगे चलकर अहंतासुर कहलाया। उसने अपना एक राज्य स्थापित किया और भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। गणेश की उपासना से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे कई वरदान दे दिए।
वरदान प्राप्त करने के बाद अहंतासुर ने भी अत्याचार और अनाचार फैलाना शुरू कर दिया। उसके आतंक से सभी देवता परेशान हो उठे। तब भगवान गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया।
धूम्रवर्ण का वर्ण धुएं के समान था और उनका रूप अत्यंत विकराल था। उनके हाथ में एक भीषण पाश था, जिससे प्रचंड ज्वालाएं निकल रही थीं। उन्होंने युद्ध में अहंतासुर को पराजित किया और अंततः उसे अपनी भक्ति प्रदान की।
