▪️सूर्यकांत उपाध्याय

टीचर ने सीटी बजाई और स्कूल के मैदान में 50 छोटे-छोटे बालक-बालिकाएँ दौड़ पड़े। सबका लक्ष्य था, मैदान के छोर तक पहुँचकर वापस लौटना। प्रथम तीन स्थान पाने वाले बच्चों को पुरस्कार मिलना था।
सभी बच्चों के माता-पिता भी मौजूद थे, इसलिए उत्साह कुछ ज्यादा ही था।
मैदान के छोर से बच्चे जैसे ही लौटे, पालकों की आवाजें गूँजने लगीं, ‘और तेज… और तेज…!’ पहले तीन बच्चों ने खुशी से अपने माता-पिता की ओर हाथ लहराए। चौथे और पाँचवें स्थान पर आए बच्चे कुछ परेशान थे। कुछ माता-पिता नाराज भी दिख रहे थे। उनके पीछे आने वाले कई बच्चे तो पुरस्कार की उम्मीद छोड़कर चलने लगे थे।
दौड़ खत्म हुई तो पाँचवें स्थान पर आई छोटी-सी बच्ची उदास चेहरा लिए अपने पापा के पास पहुँची। पापा ने उसे गोद में उठाकर कहा, ‘वेल डन बच्चा! चलो, आइसक्रीम खाते हैं। बताओ, कौन-सी आइसक्रीम खाएगी हमारी बिटिया रानी?’
‘लेकिन पापा, मेरा नंबर कहाँ आया?’ बच्ची ने पूछा।
‘पहला नंबर आया है तुम्हारा।’
‘ऐसे कैसे? मेरा तो पाँचवाँ नंबर आया है!’
पापा बोले, ‘तुम्हारे पीछे कितने बच्चे थे?’
’45 बच्चे।’
‘तो उन 45 बच्चों से आगे तुम पहली थीं। इसीलिए तुम्हें आइसक्रीम का इनाम।’
‘और मेरे आगे आए चार बच्चे?’
‘इस बार उनसे हमारा मुकाबला नहीं था। उन्होंने ज्यादा तैयारी की थी। अब हम भी अच्छी प्रैक्टिस करेंगे। अगली बार 48 में आगे रहोगी और फिर 50 में प्रथम आओगी।’
‘ऐसा हो सकता है पापा?’
‘हाँ बेटा। लेकिन हमें दूसरों से नहीं, खुद से आगे निकलना है।’
बेटी पूरी बात तो नहीं समझी, पर विश्वास से बोली, ‘जैसा आप कहें, पापा।’
पापा मुस्कुराए, ‘अब आइसक्रीम तो बताओ?’
बेटी आत्मविश्वास से बोली, ‘मुझे बटरस्कॉच चाहिए।’
बच्चों के परिणाम के समय क्या हमारा व्यवहार भी ऐसा नहीं होना चाहिए? सफलता की दौड़ में दूसरों से आगे निकलने के बजाय हर दिन खुद से बेहतर बनने की कोशिश करें। यही सोच जीवन की परीक्षा में भी अपनाएँ। विचार जरूर करें।
