▪️सूर्यकांत उपाध्याय

आगे चल रही कार कछुए की गति से बढ़ रही थी। बार-बार हॉर्न देने के बावजूद वह रास्ता नहीं दे रही थी। मैं अपना आपा खोकर चिल्लाने ही वाला था कि तभी मेरी नजर कार के पीछे लगे एक छोटे-से स्टिकर पर पड़ी। उस पर लिखा था – ‘शारीरिक रूप से दिव्यांग; कृपया धैर्य रखें।’
इतना पढ़ते ही जैसे सब कुछ बदल गया। मैं तुरंत शांत हो गया और अपनी कार की रफ्तार धीमी कर ली। इतना ही नहीं, अब मैं उस कार और उसके चालक का विशेष ध्यान रखते हुए चलने लगा, ताकि उसे किसी तरह की परेशानी न हो। मैं ऑफिस कुछ मिनट देर से जरूर पहुंचा, लेकिन मन में एक अजीब-सा संतोष था।
इस छोटी-सी घटना ने मुझे भीतर तक सोचने पर मजबूर कर दिया। क्या हमें शांत रहने और धैर्य रखने के लिए हर बार किसी स्टिकर की जरूरत पड़ती है?
हमें लोगों के साथ धैर्य और संवेदनशीलता से व्यवहार करने के लिए उनके दर्द का पता चलना क्यों जरूरी है? क्या हम तभी अच्छा व्यवहार करेंगे, जब लोग अपने माथे पर ऐसे स्टिकर चिपकाकर घूमते रहें -‘मेरी नौकरी चली गई है’, ‘मैं कैंसर से जूझ रहा हूं’, ‘मेरी शादी टूट गई है’, ‘मैं भावनात्मक रूप से टूट चुका हूं’, ‘मेरे प्रिय मित्र का अचानक निधन हो गया’, ‘मुझे लगता है कि इस दुनिया को मेरी जरूरत नहीं’ या ‘मुझे व्यापार में बहुत नुकसान हुआ है’?
सच तो यह है कि हर इंसान अपनी जिंदगी में कोई न कोई ऐसी लड़ाई लड़ रहा है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। इसलिए किसी के व्यवहार को समझे बिना तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय थोड़ा धैर्य रखना चाहिए।
- शिक्षा: हमें दिखाई देने वाले ही नहीं, लोगों के उन ‘अदृश्य स्टिकर्स’ का भी सम्मान करना चाहिए, जो उनके भीतर छिपे दर्द और संघर्ष की कहानी कहते हैं।
