▪️सूर्यकांत उपाध्याय

कल दोपहर घर के सामने एक छोटे से नीम के पेड़ के नीचे खड़े होकर मैं मोबाइल पर बात कर रहा था। पेड़ की दूसरी ओर गाय और बछड़े का एक जोड़ा बैठा सुस्ता रहा था और जुगाली कर रहा था। तभी आवाज लगाता हुआ एक सब्जी विक्रेता वहाँ आया। उसकी आवाज सुनते ही गाय के कान खड़े हो गए और उसने उसकी ओर देखा।
उसी समय पड़ोस की एक महिला सब्जियाँ खरीदने आई। अंत में मुफ्त में धनिया-मिर्च न देने पर उसने खरीदी हुई सब्जियाँ वापस कर दीं।
महिला के जाने के बाद सब्जी विक्रेता ने पालक के दो गट्ठर निकाले और गाय-बछड़े के सामने डाल दिए।
यह देखकर मुझे हैरानी हुई। जिज्ञासावश मैं उसके ठेले के पास गया। कुछ खीरे खरीदे और पैसे देते हुए पूछा, ‘भाई जी, पाँच रुपये के धनिया-मिर्च के पीछे आपने लगभग पचास रुपये की सब्जियाँ बेचने का नुकसान क्यों उठाया?’
वह मुस्कुराते हुए बोला, ‘भाई जी, यह इनका रोज का काम है। मैं एक-दो रुपये के मुनाफे पर सब्जियाँ बेचता हूँ। इसके ऊपर मुफ्त में धनिया-मिर्च भी दूँ? नहीं, यह तो नहीं हो सकता!’
मैंने पूछा, ‘तो फिर गाय के सामने पालक के दो गट्ठर क्यों डाल दिए?’
उसने बड़े सहज भाव से जवाब दिया, ‘भाई जी, मुफ्त में धनिया-मिर्च देने के बाद भी यह भरोसा नहीं कि वह महिला कल मेरा इंतजार करेगी, लेकिन ये गाय-बछड़े मेरा जरूर इंतजार करते हैं। और भाई जी, मैं इन्हें कभी मायूस नहीं करता। मेरे ठेले पर इनके लिए कुछ न कुछ रहता ही है। मैं इन्हें रोज खिलाता हूँ। अक्सर ये मुझे इसी पेड़ के नीचे बैठी मिलती हैं।’
उसकी बात सुनकर मैं सोचने लगा कि भरोसा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से पैदा होता है। जहाँ स्वार्थ होता है, वहाँ संबंध जरूरत तक सीमित रहते हैं; लेकिन जहाँ प्रेम और अपनापन होता है, वहाँ प्रतीक्षा भी होती है और विश्वास भी।
- सीख : मुफ्त में उन्हें ही खिलाइए, जो आपके प्रेम और अपनत्व की कद्र करें और जिन्हें आपसे ही कुछ पाने की अभिलाषा हो। क्योंकि सच्चा भरोसा वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के कायम रहता है!
