▪️सूर्यकांत उपाध्याय

मास्टर राजबहादुर प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे। उनका बेटा पड़ोसी जिले में जिलाधिकारी था और बहू एसएसपी। दोनों कई बार उनसे अपने साथ रहने का आग्रह कर चुके थे, लेकिन गांव में रमे रहने वाले राजबहादुर का मन वहीं लगता था।
एक दिन वे बहू से मिलने उसके बंगले पहुंचे। साधारण कुर्ता-पायजामा, गांधी टोपी, हवाई चप्पल और हाथ में कपड़े का थैला लिए वे ड्राइंगरूम में बैठ गए। उस दिन बंगले में किटी पार्टी चल रही थी। वहां मौजूद महिलाओं को उनकी पहचान नहीं मालूम थी।
एक महिला ने उन्हें देहाती कहकर मजाक उड़ाया, तो दूसरी ने उनकी वेशभूषा पर टिप्पणी की। इसके बाद सभी ठहाके लगाने लगीं। साधारण कपड़ों में बैठे बुजुर्ग की सहजता उनके लिए उपहास का विषय बन गई।
तभी एसएसपी बहू कमरे में आईं। राजबहादुर को देखते ही उन्होंने सिर पर दुपट्टा संभाला, आगे बढ़कर उनके पैर छुए और आदरपूर्वक पूछा, ‘पापा जी, रास्ते में कोई कष्ट तो नहीं हुआ? आप फोन कर देते तो मैं स्टेशन पर गाड़ी भेज देती।’
बहू का यह व्यवहार देखकर राजबहादुर के चेहरे पर संतोष और गर्व की चमक आ गई। वहां मौजूद महिलाओं को भी समझ आ गया कि जिस व्यक्ति की वे वेशभूषा देखकर हंसी उड़ा रही थीं, वह उनकी अधिकारी का पूजनीय ससुर है।
यह प्रसंग हमें सिखाता है कि व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों, पद या बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि उसके संस्कारों से होती है। उच्च शिक्षा, बड़ी नौकरी और ऊंचा पद जीवन में सफलता दिला सकते हैं, लेकिन बड़ों का सम्मान, विनम्रता और मानवीय व्यवहार ही व्यक्तित्व को वास्तविक ऊंचाई देते हैं।
