▪️सूर्यकांत उपाध्याय

विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बसे एक गांव में धर्मदेव नाम का कुशल कुम्हार रहता था। उसके बनाए मटके भीषण गर्मी में भी पानी को ठंडा रखते थे। उसकी एक खास आदत थी। वह भट्टी से निकले मटकों को बेचने से पहले सात दिनों तक नीम के पेड़ की छाया में रखता था।
एक दिन उसका पुत्र केशव नगर से लौटा। उसने पिता से पूछा, “जब मटके तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें सात दिन तक रखने का क्या लाभ? इन्हें तुरंत बाजार में बेचने से आमदनी बढ़ सकती है।”
धर्मदेव मुस्कुराकर बोला, “बेटा, आग मिट्टी को आकार देती है, लेकिन धैर्य उसे मजबूती देता है।”
पिता की बात को पुरानी सोच मानकर केशव ने एक मटका तुरंत बाजार में बेच दिया। दूसरा मटका पिता ने नियमानुसार सात दिनों तक छाया में रखा।
कुछ दिनों बाद भीषण गर्मी पड़ी। व्यापारी के घर रखा मटका तेज धूप और ताप के कारण चटक गया। उसका सारा पानी बह गया। व्यापारी ने धर्मदेव से शिकायत की। तब धर्मदेव ने उसे सात दिनों तक छाया में रखा दूसरा मटका दिया। वह मटका भीषण गर्मी में भी सुरक्षित रहा और उसका पानी ठंडा बना रहा।
यह देखकर केशव ने पिता से पूछा, “दोनों मटके एक ही मिट्टी से बने और एक ही भट्टी में पके, फिर उनमें इतना अंतर कैसे आया?”
धर्मदेव ने समझाया, “मिट्टी आग में तपकर आकार पाती है, लेकिन उसे उस ताप को सहने की शक्ति शांत वातावरण में मिलती है। आग अनुभव देती है और छाया धैर्य सिखाती है।”
केशव को पिता की बात समझ आ गई। उसने जाना कि केवल ज्ञान और अनुभव पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें आत्मसात करने के लिए धैर्य और आत्म-चिंतन भी जरूरी है।
- सीख: जीवन में सफलता पाने के लिए ज्ञान और अनुभव जितने आवश्यक हैं, उतना ही जरूरी धैर्य भी है। जल्दबाजी में मिली उपलब्धियां टिकाऊ नहीं होतीं।
