
● मुंबई
मुंबई में हिंदी साहित्य के इतिहास में 25 जनवरी 2026 की शाम एक उल्लेखनीय और प्रेरणादायी अध्याय के रूप में दर्ज हो गई। इस दिन मीरा रोड स्थित विरुंगला सांस्कृतिक केंद्र का सभागार हिंदी साहित्य सृजन और सामूहिक संवाद का सशक्त मंच बना, जहां वर्ष 2025–26 में प्रकाशित पुस्तकों का सामूहिक लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ।
इस अभिनव आयोजन की परिकल्पना और सफल क्रियान्वयन स्वर संगम फाउंडेशन के समर्पित साहित्यसेवियों हृदयेश मयंक, रमन मिश्र, राकेश शर्मा और डॉ. हरिप्रसाद राय द्वारा किया गया। इन साथियों ने बिना किसी बड़े व्यावसायिक, सरकारी संस्थान के सहयोग के, साहित्य को उसके आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ खड़ा कर एक मिसाल कायम की।
इस समारोह में 19 साहित्यकारों की कृतियों का सामूहिक लोकार्पण हुआ। सभी रचनाकार अपनी-अपनी पुस्तकों के साथ मंच पर उपस्थित रहे और उन्होंने अपनी रचनात्मक यात्रा, सरोकारों तथा लेखन-अनुभवों को श्रोताओं से साझा किया। कार्यक्रम लगभग चार घंटे तक चला, जिसे खचाखच भरे हॉल में साहित्य-प्रेमियों ने पूरे धैर्य और एकाग्रता के साथ सुना, यह अपने-आप में साहित्य के प्रति गहरी प्रतिबद्धता का प्रमाण था।
इस सामूहिक लोकार्पण की एक विशिष्ट विशेषता यह रही कि इसमें विभिन्न प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। इनमें न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकों की संख्या सर्वाधिक रही। कार्यक्रम के दौरान अनेक साहित्यकारों ने इस प्रकाशन संस्था की ईमानदारी, समयबद्धता और लेखक-केंद्रित दृष्टिकोण की मुक्तकंठ से सराहना की। किसी प्रकाशक के प्रति इस प्रकार की सामूहिक प्रशंसा विरल ही सुनने को मिलती है।
कार्यक्रम की गरिमा को और ऊँचाई प्रदान की वरिष्ठ साहित्यकारों एवं विशिष्ट अतिथियों धीरेन्द्र अस्थाना, असगर वज़ाहत, प्रेम जनमेजय और गंगाराम राजी की उपस्थिति ने, जो इस ऐतिहासिक साहित्यिक क्षण के साक्षी बने।
कार्यक्रम का सशक्त, सुव्यवस्थित और जीवंत संचालन रमन मिश्र द्वारा किया गया। उनके कुशल मंच-संचालन ने श्रोताओं को पूरे चार घंटे बाँधे रखा और कार्यक्रम कहीं भी शिथिल नहीं पड़ा।
इस समारोह में जिन साहित्यकारों की कृतियों का लोकार्पण हुआ, वे हैं रमेश राजहंस, हरजिंदर सिंह सेठी, विभा रानी, अनूप सेठी, हृदयेश मयंक, रमाकांत शर्मा, अजय रोहिल्ला, मंजुल भारद्वाज, राकेश शर्मा, रमेश यादव, रीता दास राम, नवीन कुमार, मुस्तहसन अज़्म, प्रतिमा राज, भूपेन्द्र मिश्र और एम. के. चौबे।
स्वर संगम फाउंडेशन की यह पहल न केवल एक साहित्यिक आयोजन थी बल्कि यह इस विश्वास की पुनर्स्थापना भी थी कि हिंदी साहित्य आज भी अपने रचनाकारों, पाठकों और प्रतिबद्ध आयोजकों के बल पर आत्मनिर्भर होकर आगे बढ़ सकता है। मुंबई में हिंदी साहित्य सृजन के इतिहास में यह आयोजन एक स्मरणीय और प्रेरक अध्याय के रूप में दर्ज रहेगा।
