
● नई दिल्ली
भारत तेजी से एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौती की दहलीज पर खड़ा है। यह संकट अब उम्र की सीमाओं में बंधा नहीं रहा। स्कूलों के छात्र, कॉलेज के युवा और कामकाजी पेशेवर सब इसकी जद में आते दिख रहे हैं। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (आईपीएस) के 77वें राष्ट्रीय सम्मेलन 2026 में विशेषज्ञों ने बताया कि देश में पाए जाने वाले करीब 60 प्रतिशत मानसिक विकार 35 वर्ष से कम उम्र के लोगों में दर्ज हो रहे हैं।
सम्मेलन में देशभर से जुटे मनोचिकित्सकों, चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं ने भारत के बदलते मानसिक स्वास्थ्य परिदृश्य पर गहन चर्चा की। विशेषज्ञों के अनुसार मानसिक बीमारियां अब पहले से कहीं कम उम्र में जड़ पकड़ रही हैं। इनकी शुरुआत प्रायः किशोरावस्था या युवावस्था के शुरुआती दौर में हो रही है, जहां औसत शुरुआत की उम्र 19–20 वर्ष बताई गई।
रिपोर्ट में चिंता, अवसाद, नशे से जुड़ी दिक्कतें और व्यवहार संबंधी विकारों को युवाओं के सबसे उत्पादक वर्षों पर सीधा असर डालने वाला बताया गया। इसका प्रभाव पढ़ाई, करियर, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक जीवन तक फैल रहा है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, डिजिटल लत, सोशल मीडिया का दबाव, भविष्य की अनिश्चितता और काम का तनाव इन समस्याओं को और गहरा कर रहे हैं।
दिल्ली स्थित एएनसीआईपीएस के आयोजन सचिव और होप केयर इंडिया के निदेशक डॉ. दीपक रहेजा ने कहा कि सकारात्मक संकेत यह है कि युवा अब मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अधिक जागरूक हो रहे हैं और पेशेवर मदद लेने में संकोच नहीं कर रहे।
विशेषज्ञों ने सरकार, शिक्षा संस्थानों और समाज से आह्वान किया कि मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान प्राथमिकता दी जाए, ताकि समय रहते इस बढ़ते संकट पर काबू पाया जा सके।
