■ कहा, मौजूदा स्वरूप में ये नियम अस्पष्ट हैं

● नई दिल्ली
यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) की नई गाइडलाइंस पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल विराम लगा दिया है। गुरुवार को शीर्ष अदालत ने एक अहम आदेश पारित करते हुए ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस–2026’ को तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया। अदालत का कहना है कि मौजूदा स्वरूप में ये नियम अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि जब तक नियमों में आवश्यक स्पष्टता नहीं लाई जाती, तब तक इन्हें लागू करना उचित नहीं होगा। अदालत ने निर्देश दिया कि इस अंतराल में वर्ष 2012 के यूजीसी नियम ही प्रभावी रहेंगे।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई की तारीख 19 मार्च तय की गई है। इस आदेश को उच्च शिक्षा संस्थानों, शिक्षकों और छात्रों के लिहाज़ से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे नई गाइडलाइंस के अमल पर अस्थायी रोक लग गई है।
पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 15(4) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राज्य को एससी-एसटी समुदायों के हित में विशेष और प्रभावी कानून बनाने का अधिकार देता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पहले से लागू नियम अधिक व्यापक और समावेशी थे, तो नए प्रावधानों के जरिए संरक्षण के स्तर में कमी तर्कसंगत नहीं मानी जा सकती। ‘नो-रिग्रेशन’ यानी पीछे न लौटने के सिद्धांत का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यह सिद्धांत सामाजिक न्याय और समानता से जुड़े सभी कानूनों पर समान रूप से लागू होता है।
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने एक मूलभूत सवाल उठाया—क्या 75 वर्षों में जातिविहीन समाज की दिशा में हुई प्रगति से अब पीछे हटने का संकेत दिया जा रहा है? उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय, स्कूल और कॉलेज समाज से अलग-थलग नहीं होते। शैक्षणिक परिसरों में यदि भेदभाव या विभाजनकारी सोच पनपती है, तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है।
अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिए कि इस विषय पर प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं की एक समिति गठित की जाए, जिसकी संरचना अदालत की स्वीकृति से तय होगी।
