■ सूर्यकांत उपाध्याय

भगवान शिव और माता पार्वती के चौसर खेलने का वर्णन पुराणों में मिलता है। मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर मंदिर में आज भी यह मान्यता है कि रात में शिव-पार्वती चौसर खेलते हैं। प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि पर यह चौसर बदली जाती है। इसके बाद वर्ष भर गर्भगृह में प्रतिदिन रात को शिव और पार्वती के लिए चौसर-पांसे की बिसात बिछाई जाती है।
यह परंपरा यहां हजारों वर्षों से चली आ रही है। यह मंदिर भगवान राम के पूर्वजों से जुड़ा माना जाता है।
नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मान्यता है कि इसके दर्शन के बिना चारों धामों की यात्रा अधूरी मानी जाती है। पुराणों के अनुसार इस मंदिर की स्थापना राजा मांधाता ने की थी, जिन्हें भगवान राम का पूर्वज माना जाता है। यह मंदिर वेदकालीन बताया जाता है। भगवान शिव के सोलह सोमवार व्रत की कथा में भी इसका उल्लेख मिलता है। श्रद्धालुओं की आस्था है कि भगवान शिव और माता पार्वती प्रतिदिन रात्रि में यहां आकर चौसर-पांसे खेलते हैं।
रात में शयन आरती के बाद ज्योतिर्लिंग के सामने प्रतिदिन चौसर-पांसे की बिसात सजाई जाती है। यह परंपरा मंदिर की स्थापना के समय से ही चली आ रही है। कई बार ऐसा हुआ है कि रात में रखे गए चौसर और पांसे सुबह अपने स्थान से हटे हुए पाए गए।
ओंकारेश्वर भगवान शिव का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है, जहां प्रतिदिन गुप्त आरती होती है। इस दौरान पुजारियों के अतिरिक्त किसी को भी गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं होती। इसकी शुरुआत रात 8:30 बजे रुद्राभिषेक से होती है। अभिषेक के बाद पुजारी पट बंद कर शयन आरती करते हैं। आरती के पश्चात पट खोले जाते हैं और चौसर-पांसे सजाकर पुनः पट बंद कर दिए जाते हैं। प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान के लिए नए चौसर-पांसे अर्पित किए जाते हैं।
बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि चौसर का निर्माण स्वयं भगवान शिव ने किया था। एक दिन महादेव ने देवी पार्वती से कहा कि उन्होंने एक नए खेल का निर्माण किया है। उनके अनुरोध पर दोनों चौसर खेलने लगे। चूंकि चौसर का निर्माण महादेव ने किया था, इसलिए वे लगातार जीतते जा रहे थे।
अंततः माता पार्वती ने कहा कि यदि यह एक खेल है, तो इसके नियम भी होने चाहिए। उनके ऐसा कहने पर महादेव ने चौसर के नियम बनाए। इसके बाद खेल पुनः आरंभ हुआ। इस बार माता पार्वती बार-बार विजयी होने लगीं और थोड़े ही समय में भगवान शिव अपना सब कुछ हार गए।
अंत में भगवान शिव ने लीला करते हुए कैलाश पर्वत को भी दांव पर लगाया और हार गए। इसके पश्चात वे पत्तों के वस्त्र धारण कर देवी पार्वती से रूठने का नाटक करते हुए गंगा तट चले गए। कुछ समय बाद जब कार्तिकेय कैलाश लौटे, तो उन्हें भगवान शिव के चौसर में हारने की बात ज्ञात हुई।
कार्तिकेय अपने पिता से अत्यधिक स्नेह करते थे। इसी कारण उन्होंने माता पार्वती को चौसर में हराकर भगवान शिव की सारी वस्तुएं पुनः प्राप्त कर लीं और उन्हें लेने गंगा तट की ओर चले गए। इधर माता पार्वती यह जानकर व्याकुल हो गईं कि कार्तिकेय महादेव की सभी वस्तुएं लेकर चले गए हैं और उनके स्वामी भी उनसे दूर हो गए हैं। यह बात उन्होंने अपने पुत्र गणेश को बताई।
गणेश अपनी माता से अत्यंत प्रेम करते थे। वे माता का दुःख सहन न कर सके और भगवान शिव को ढूंढने निकल पड़े। गंगा तट पर उनकी भेंट भगवान शिव से हुई। वहां उन्होंने उनके साथ चौसर खेला और अपनी माया से उन्हें पराजित कर उनकी सभी वस्तुएं पुनः प्राप्त कर लीं। गणेश ये सभी वस्तुएं लेकर माता पार्वती के पास पहुंचे और अपनी विजय का समाचार दिया। गणेश को अकेले देखकर माता पार्वती ने कहा कि तुम्हें अपने पिता को भी साथ लेकर आना चाहिए था। तब गणेश पुनः भगवान शिव को खोजने निकल पड़े।
इस बार भगवान शिव उन्हें हरिद्वार में कार्तिकेय के साथ विचरण करते हुए मिले। जब गणेश ने शिव से कैलाश लौटने का आग्रह किया, तो उन्होंने कहा कि यदि माता पार्वती एक बार फिर उनके साथ चौसर खेलेंगी, तभी वे लौटेंगे। गणेश ने यह शर्त माता पार्वती को बताई और उन्हें लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे। वहां माता पार्वती मुस्कराते हुए बोलीं,“हे नाथ! अब आपके पास हारने के लिए शेष ही क्या है?”
तब देवर्षि नारद ने अपनी वीणा भगवान शिव को दांव पर लगाने के लिए दे दी। भगवान शिव की इच्छा से भगवान विष्णु पासों के रूप में प्रकट हुए और भगवान ब्रह्मा मध्यस्थ बने। इस बार भगवान शिव चौसर के खेल में माता पार्वती को बार-बार हराने लगे।
जब माता पार्वती अपना सब कुछ हार गईं, तब महादेव ने हंसते हुए इस लीला का रहस्य बताया। यद्यपि भगवान शिव ने यह सब केवल ठिठोली में किया था, पर माता पार्वती को अत्यंत क्रोध आ गया।
क्रोधित होकर उन्होंने भगवान शिव को श्राप दिया कि वे सदैव अपने मस्तक पर गंगा का भार धारण करेंगे। देवर्षि नारद को कभी एक स्थान पर न ठहरने का श्राप मिला और भगवान विष्णु को पृथ्वी पर जन्म लेकर स्त्री-वियोग सहने का श्राप प्राप्त हुआ। माता पार्वती ने अपने ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को भी यह श्राप दिया कि वे सदा बाल्यावस्था में ही रहेंगे।
बाद में माता पार्वती को अपने श्रापों पर गहरा पश्चाताप हुआ। उन्होंने भगवान शिव और भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे इन श्रापों को निष्फल कर दें। तब भगवान विष्णु ने कहा कि वे जगन्माता हैं और उनके श्राप को निष्फल करना उनका अपमान होगा। इसी कारण सभी को माता पार्वती द्वारा दिए गए श्रापों को भोगना पड़ा।
