■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार मथुरा के निकट एक गाँव में एक छोटी लड़की रहती थी। वृंदावन पास होने के कारण उस गाँव से बहुत-से लोग ठाकुर जी के दर्शन के लिए जाते थे। जब वह छोटी बच्ची पाँच वर्ष की हुई, तो उसके घरवाले बाँके बिहारी जी के दर्शन के लिए जाने लगे। उस समय यातायात के साधन बहुत कम थे। उन्हें जाते देख उस बच्ची ने कहा-
“पिताजी, मुझे भी अपने साथ ठाकुर जी के दर्शन के लिए ले चलो।”
पिताजी ने कहा-
“बेटा, अभी तुम छोटी हो, इतना चल नहीं पाओगी। थोड़ी बड़ी हो जाओ, तब तुम्हें साथ ले चलेंगे।”
कुछ समय बीता। जब वह सात वर्ष की हुई, तो फिर किसी कारणवश घरवालों का वृंदावन जाना हुआ। उस बच्ची ने फिर कहा-
“पिताजी, अब तो मुझे भी साथ ले चलो ठाकुर जी के दर्शन के लिए।”
लेकिन किसी कारणवश वे उसे साथ नहीं ले जा सके।
बच्ची के मन में ठाकुर जी के प्रति अत्यंत प्रगाढ़ प्रेम था। वह मन-ही-मन उनका चिंतन करती रहती और इस बात से दुखी रहती कि आज तक ठाकुर जी के दर्शन नहीं कर पाई। गाँव के उसके सभी सहपाठी प्रभु जी के दर्शन कर चुके थे। जब वे ठाकुर जी के मंदिर और उनके रूप का वर्णन करते, तो इस बच्ची के मन में दर्शन की ललक और भी बढ़ जाती।
समय अपने पंख लगाकर उड़ता गया। अवसर मिले, पर शायद उसके भाग्य में तब तक ठाकुर जी के दर्शन नहीं लिखे थे। जब वह सत्रह वर्ष की हुई, तो उसके पिताजी को उसके विवाह की चिंता होने लगी। उसका विवाह तय हो गया। संयोग ऐसा था कि ठाकुर जी के प्रति उसके प्रेम के कारण उसका विवाह वृंदावन के पास ही एक गाँव में हो गया।
वह लड़की बहुत प्रसन्न थी कि अब तो उसे ठाकुर जी के दर्शन अवश्य होंगे। विवाह संपन्न हुआ। वह ससुराल गई और फिर रस्म निभाने के लिए कुछ दिनों बाद अपने मायके आई।
एक-दो दिन बाद वह और उसका पति वापस ससुराल जा रहे थे। रास्ते में यमुना नदी के पास उसके पति ने कहा-
“तुम थोड़ी देर यहाँ बैठो, मैं यमुना में स्नान करके आता हूँ।”
उस समय उस लड़की का ध्यान ठाकुर जी की ओर चला गया। वह सोचने लगी कि कब उसके दर्शन होंगे। उसने लंबा घूँघट निकाल रखा था। गाँव था, ससुराल थी और वहीं बैठ गई। मन-ही-मन विचार करने लगी-
“देखो, ठाकुर जी की कितनी कृपा है। बचपन से उन्हें भजा, दर्शन के लिए तरसती रही, और उनकी कृपा से अब मेरा विवाह श्रीधाम वृंदावन में ही हुआ है।
पर इतने वर्षों से ठाकुर जी को मानती हूँ, फिर भी उनसे कोई रिश्ता नहीं जोड़ा।”
फिर सोचने लगी-
“ठाकुर जी की उम्र क्या होगी? मेरे हिसाब से लगभग सत्रह वर्ष के ही होंगे। मेरे पति इक्कीस वर्ष के हैं, तो वे उनसे थोड़े छोटे हुए। इस तरह वे मेरे देवर हुए। लो, आज से ठाकुर जी मेरे देवर हैं।”
यह सोचकर वह बहुत प्रसन्न हुई और मन-ही-मन कहने लगी-
“ठाकुर जी! आज से मैं आपकी भाभी और आप मेरे देवर हो गए। पर वह समय कब आएगा, जब आप मुझे ‘भाभी-भाभी’ कहकर पुकारेंगे?”
वह यह सब सोच ही रही थी कि तभी एक किशोर अवस्था का साँवला-सा लड़का वहाँ आ गया और बोला—
“भाभी… भाभी…”
लड़की चौंक गई और अपने भाव से बाहर आई। वह सोचने लगी-
“मैं तो यहाँ नई हूँ, यह मुझे भाभी कहकर कौन बुला रहा है?”
वह घूँघट उठाने से डर रही थी कि कहीं गाँव के किसी बड़े-बुज़ुर्ग ने देख लिया तो बदनामी होगी। लड़का बार-बार पुकारता रहा, पर वह उत्तर नहीं दे रही थी। वह पास आकर बोला-
“भाभी, ज़रा अपना चेहरा तो दिखाइए।”
वह और कसकर घूँघट पकड़कर बैठ गई। लड़के ने कहा-
“भाभी, आपने यह पर्दा क्यों कर रखा है? हम तो आपके देवर हैं।”
लड़की ने उसे एक नज़र देखा और बोली-
“नहीं, हम आपको नहीं जानते।”
और फिर घूँघट ओढ़ लिया।
लड़का बोला-
“नहीं-नहीं, हम आपको जानते हैं। आप उसी गाँव की हैं, हमारे घर से थोड़ी ही दूर। भाभी, ज़रा चेहरा दिखाइए।”
वह बोली-
“जब कह दिया कि हम आपको नहीं जानते, तो बस। किसी ने देख लिया तो बहुत मार पड़ेगी।”
लड़के ने हँसते हुए कहा-
“भाभी, आप तो नाराज़ हो रही हैं। हम आपके प्यारे देवर हैं। आपसे मिलने के लिए इतनी दूर आए, और आप हमसे बात भी नहीं कर रहीं।”
इतना कहकर उसने अचानक घूँघट खींच लिया, उसका चेहरा देखा और भाग गया।
थोड़ी देर में उसका पति आ गया। उसने सारी बात अपने पति को बता दी।
पति बोला;
“चिंता मत करो। वृंदावन इतना बड़ा नहीं है। अगर वह लड़का फिर कहीं मिल गया, तो उसकी हड्डी-पसली एक कर दूँगा। जब भी दिखे, मुझे ज़रूर बताना।”
कुछ दिनों बाद उसकी सास ने अपने बेटे से कहा-
“बेटा, अब बहू भी आ गई है। तुम दोनों अभी तक बाँके बिहारी जी के दर्शन के लिए नहीं गए। कल बहू को ठाकुर जी के दर्शन करा लाना।”
अगले दिन पति-पत्नी मंदिर गए। मंदिर में बहुत भीड़ थी। पति बोला-
“तुम औरतों के साथ आगे जाकर दर्शन कर लो, मैं पीछे से आता हूँ।”
वह आगे तो गई, पर घूँघट नहीं उठाया। डर लग रहा था कि कोई बड़ा-बुज़ुर्ग देख लेगा। काफी देर बाद पति पीछे से आया और बोला-
“अरी बाबली! ठाकुर जी सामने हैं। घूँघट क्यों नहीं खोलती? घूँघट नहीं खोलेगी तो दर्शन कैसे करेगी?”
उसने घूँघट उठाया और जैसे ही बाँके बिहारी जी की ओर देखा, तो ठाकुर जी की जगह वही बालक मुस्कुराता हुआ दिखाई दिया। वह घबरा कर चिल्लाई-
“सुनिए जी! जल्दी आइए!”
पति दौड़कर आया-
“क्या हुआ?”
वह बोली-
“उस दिन जो मुझे भाभी-भाभी कहकर भाग गया था, वही लड़का यहाँ है।”
पति बोला-
“कहाँ है? अभी देखता हूँ।”
उसने ठाकुर जी की ओर इशारा कर दिया-
“यही है, आपके सामने।”
पति यह देखकर अवाक रह गया। वहीं मंदिर में वह अपनी पत्नी के चरणों में गिर पड़ा और बोला –
“तुम धन्य हो। तुम्हारे हृदय में ठाकुर जी के प्रति सच्चा भाव है। हम वर्षों से वृंदावन में रहते हैं, पर आज तक उनके दर्शन नहीं हुए। तुम्हारे भाव इतने उच्च हैं कि ठाकुर जी स्वयं तुम्हें दर्शन देने आ गए।”
ठाकुर जी से सच्चे प्रेम से जो भी रिश्ता जोड़ा जाए, वे उसे अवश्य निभाते हैं-
जैसे इस कथा में उन्होंने ‘देवर’ का रिश्ता निभाया।
