■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक स्त्री थी। उसे बात-बात पर गुस्सा आ जाता था। उसकी इस आदत से पूरा परिवार परेशान रहता था। इसी कारण परिवार में अक्सर कलह का माहौल बना रहता था।
एक दिन उस महिला के दरवाजे पर एक साधु आए। महिला ने साधु को अपनी समस्या बताई। उसने कहा,
“महाराज! मुझे बहुत जल्दी गुस्सा आ जाता है। मैं चाहकर भी अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाती। कोई उपाय बताइए।”
साधु ने अपने झोले से एक दवा की शीशी निकालकर उसे दी और कहा, “जब भी गुस्सा आए, इस शीशी से चार बूंद दवा अपनी जीभ पर डाल लेना। दस मिनट तक दवा को मुँह में ही रखना है। इस दौरान मुँह नहीं खोलना, नहीं तो दवा असर नहीं करेगी।”
महिला ने साधु के बताए अनुसार दवा का प्रयोग शुरू किया। सात दिन में ही उसकी गुस्सा करने की आदत छूट गई। सात दिन बाद जब वही साधु फिर उसके दरवाजे पर आए, तो महिला उनके चरणों में गिर पड़ी।
उसने कहा,“महाराज! आपकी दवा से मेरा क्रोध समाप्त हो गया। अब मुझे गुस्सा नहीं आता और मेरे परिवार में शांति का माहौल बना रहता है।”
तब साधु महाराज ने उसे बताया कि वह कोई दवा नहीं थी। उस शीशी में केवल पानी भरा था।
उन्होंने कहा, “गुस्से का इलाज केवल चुप रहकर किया जा सकता है, क्योंकि क्रोध में व्यक्ति उलटा-सीधा बोल देता है, जिससे विवाद बढ़ता है। इसलिए क्रोध का सबसे बड़ा उपचार मौन है।”
