■ संघ के शताब्दी समारोह में सरसंघचालक ने नेतृत्व, सेवा, समाज और राजनीति पर रखी स्पष्ट दृष्टि

● मुंबई
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष समारोह में सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन, नेतृत्व और समाज के प्रति संघ की दृष्टि को स्पष्ट और संतुलित शब्दों में रखा। पद छोड़ने से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने साफ कहा कि संघ का आदेश सर्वोपरि है। यदि संगठन कहेगा तो वे उसी क्षण दायित्व से मुक्त हो जाएंगे, मगर समाजसेवा से कभी विराम नहीं लेंगे।
उम्र को लेकर चल रही चर्चाओं पर भागवत ने बताया कि संघ में 75 वर्ष के बाद बिना पद के कार्य करने की परंपरा रही है। उन्होंने कहा, “मैं 75 वर्ष का हो चुका हूं और संघ को इसका पूरा ज्ञान है। इसके बावजूद संगठन ने मुझसे दायित्व निभाते हुए काम जारी रखने को कहा है। जब भी संघ आदेश देगा, मैं पद छोड़ दूंगा।”
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आरएसएस का उद्देश्य प्रचार नहीं, समाज में संस्कारों का निर्माण है। आवश्यकता से अधिक प्रचार दिखावे को जन्म देता है और वहीं से अहंकार पनपता है। प्रचार वर्षा की तरह होना चाहिए—समयानुकूल और सीमित। भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ अपने स्वयंसेवकों से पूर्ण क्षमता तक कार्य कराता है, पर संगठन के इतिहास में किसी को जबरन सेवानिवृत्त नहीं किया गया।
नेतृत्व को लेकर उन्होंने कहा कि सरसंघचालक हिंदू होगा, पर उसकी जाति कोई मानदंड नहीं है। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या ब्राह्मण—किसी भी जाति का व्यक्ति संघ का प्रमुख बन सकता है। शीर्ष दायित्व सबसे समर्पित और सक्षम कार्यकर्ता को दिया जाता है। इस पद के लिए चुनाव नहीं, सुव्यवस्थित नियुक्ति प्रक्रिया अपनाई जाती है।
भागवत ने कहा कि भारत को विश्व गुरु बनना है और यह लक्ष्य भाषणों से नहीं, आचरण से पूरा होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत के मुस्लिम और ईसाई भी उतने ही अपने हैं, जितने अन्य नागरिक। राजनीति पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संघ का लक्ष्य समाज को संगठित करना है; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस के प्रधानमंत्री नहीं हैं और भाजपा एक स्वतंत्र राजनीतिक दल है।
