■ सूर्यकांत उपाध्याय

जब सिद्धार्थ ने राजपाट का त्याग किया, तब वे वैभव से विरक्त होकर वन-वन भटकने लगे। जो कभी बिना जूतों के एक कदम भी न चलते थे, वे अब नंगे पाँव तपती रेत पर चल रहे थे एक भिक्षु की तरह, पूर्णतः सरल और निर्व्याज।
एक दिन वे नदी तट पर विश्राम कर रहे थे। रेत पर उनके चरणचिन्ह स्पष्ट अंकित थे। उसी समय काशी से लौटता एक प्रखर ज्योतिषी वहाँ पहुँचा। वर्षों के अध्ययन और साधना से वह ज्योतिष शास्त्र में पारंगत हो चुका था। उसने जब उन पदचिन्हों को देखा तो चौंक उठा। शास्त्रों के अनुसार वे किसी चक्रवर्ती सम्राट के चरणचिन्ह थे, ऐसे सम्राट के, जो समस्त पृथ्वी पर राज्य करता है। पर यह कैसे संभव है कि एक चक्रवर्ती तपती दोपहर में नंगे पाँव रेत पर चले?
संशय से भरा वह पदचिन्हों का अनुसरण करता हुआ वृक्ष के नीचे पहुँचा, जहाँ बुद्ध शांत भाव से बैठे थे। फटे वस्त्र, पास में भिक्षापात्र, पर मुखमंडल दिव्य तेज से दीप्त। ज्योतिषी असमंजस में पड़ गया। उसने विनम्रता से पूछा, “क्या मेरे शास्त्र भ्रमित हैं? क्या मेरे बारह वर्षों का अध्ययन व्यर्थ हुआ?”
बुद्ध मुस्कुराए, “चिंता मत करो। तुम्हारे शास्त्र अतीत को पढ़ते हैं। ये चरणचिन्ह मेरे अतीत के हैं। पर जिसने अतीत को त्याग दिया, उसके भविष्य का अनुमान कैसे होगा?”
ज्योतिषी ने पुनः पूछा, “आप कौन हैं? सम्राट, देवदूत या मनुष्य?”
बुद्ध ने शांत स्वर में कहा, “मैं कोई नहीं हूँ।”
यही बुद्ध का बोध है। जब व्यक्ति नाम, रूप, अहंकार और उपाधियों से मुक्त हो जाता है, तभी वह ‘कोई नहीं’ बनता है और वही अवस्था सर्वोच्च है। जो ‘कुछ’ है, उससे बड़ा कोई और हो सकता है; पर जो ‘कोई नहीं’ है, उससे महान कोई नहीं।
