
● मुंबई
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में एक नई बहस ने जोर पकड़ लिया है। OpenAI के लोकप्रिय चैटबॉट ChatGPT में संभावित विज्ञापनों को लेकर मतभेद सामने आ गए हैं। जहां कंपनी इसे टिकाऊ राजस्व मॉडल के रूप में देख रही है, वहीं एक पूर्व शोधकर्ता ने इसे उपयोगकर्ताओं की निजता और भरोसे से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल व्यावसायिक निर्णय नहीं, बल्कि डेटा सुरक्षा और नैतिकता की कसौटी भी है।
हाल ही में Joey Hitzig ने कंपनी से अलग होने के बाद विज्ञापन मॉडल पर खुलकर चिंता जताई। उनका कहना है कि ChatGPT अब सामान्य डिजिटल प्लेटफॉर्म नहीं रहा, बल्कि यह करोड़ों लोगों की निजी बातचीत, आशंकाओं और जीवन से जुड़े अनुभवों का अभूतपूर्व संग्रह बन चुका है।
हिटज़िग का तर्क है कि यह मुद्दा केवल बैनर ऐड या प्रायोजित उत्तरों तक सीमित नहीं है। बीते वर्षों में उपयोगकर्ताओं ने इस एआई प्रणाली से स्वास्थ्य, रिश्तों, आस्था, पहचान और निजी दुविधाओं पर खुलकर संवाद किया है। सोशल मीडिया के विपरीत, यहां बातचीत अधिक व्यक्तिगत, प्रत्यक्ष और बिना दिखावे की होती है। लोगों ने इसे एक निष्पक्ष और सुरक्षित मंच मानकर अपनी संवेदनशील जानकारी साझा की है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि उपयोगकर्ताओं ने जिस स्तर की ईमानदारी और विश्वास के साथ संवाद किया है, वह डिजिटल इतिहास में दुर्लभ है। ऐसे में यदि इसी डेटा के आधार पर विज्ञापन रणनीतियां तैयार की जाती हैं, तो यह उपयोगकर्ताओं के व्यवहार को प्रभावित करने या दिशा देने का माध्यम बन सकता है। फिलहाल इस तरह की संभावनाओं से निपटने के लिए पर्याप्त नियामकीय ढांचा स्पष्ट नहीं है।
दूसरी ओर, OpenAI संकेत दे चुका है कि वह भविष्य में विज्ञापनों के सीमित परीक्षण पर विचार कर सकता है। कंपनी का दावा है कि उपयोगकर्ताओं की निजी बातचीत न तो विज्ञापनदाताओं के साथ साझा की जाएगी और न ही डेटा बेचा जाएगा।
इसके बावजूद, आलोचकों का कहना है कि असली चिंता वर्तमान व्यवस्था नहीं, बल्कि भविष्य की संस्थागत प्राथमिकताओं को लेकर है। जैसे ही विज्ञापन आय का स्रोत बनते हैं, नीतिगत निर्णयों की दिशा बदलने की आशंका बनी रहती है। यही कारण है कि ChatGPT में विज्ञापनों की संभावित एंट्री केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि डिजिटल भरोसे की परीक्षा भी मानी जा रही है।
