■ फर्जी फैसलों के हवाले पर जताई गंभीर चिंता

● नई दिल्ली
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) उपकरणों की मदद से तैयार की जा रही याचिकाओं में बढ़ती अनियमितताओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाला बागची शामिल थे, ने पाया कि कुछ याचिकाओं में ऐसे न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया गया है जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है।
सुनवाई के दौरान “दया बनाम मानवता” जैसे काल्पनिक मामलों के उद्धरण सामने आए, जिस पर पीठ ने कड़ी आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बताया कि हाल की एक सुनवाई में उन्हें ऐसे ही एक फर्जी निर्णय का उल्लेख मिला। वहीं, मुख्य न्यायाधीश ने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अदालत में हुई समान घटना का जिक्र करते हुए कहा कि कई उद्धृत फैसले जांच में पूरी तरह मनगढ़ंत पाए गए।
पीठ ने स्पष्ट कहा कि याचिका तैयार करने में एआई का अंधाधुंध उपयोग अनुचित है। न्यायाधीशों के अनुसार, इस प्रवृत्ति से न केवल अदालत को गुमराह करने का खतरा है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। यहां तक कि वास्तविक निर्णयों के संदर्भ में भी कई बार तथ्यों और अनुच्छेदों के गलत या गढ़े गए उद्धरण पेश किए जा रहे हैं, जिससे न्यायाधीशों पर सत्यापन का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
ये टिप्पणियां शिक्षाविद रूप रेखा वर्मा द्वारा दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आईं। हालांकि मामला राजनीतिक भाषणों से जुड़ा था, अदालत ने इस अवसर पर कानूनी दस्तावेजों में एआई के दुरुपयोग की बढ़ती प्रवृत्ति पर स्पष्ट संदेश दिया।
