■ सूर्यकांत उपाध्याय

समुद्र मंथन के समय लक्ष्मीजी से पहले उनकी बड़ी बहन ज्येष्ठा, जिन्हें दरिद्रा भी कहा जाता है, प्रकट हुई थीं। ज्येष्ठा भगवान विष्णु से विवाह करना चाहती थीं, परंतु भगवान ने लक्ष्मीजी का वरण किया। इसी कारण दोनों बहनों के बीच मनमुटाव बना रहता था। एक दिन यह निश्चय हुआ कि दोनों अपने-अपने प्रभाव से सिद्ध करेंगी कि कौन श्रेष्ठ है।
इसके लिए उन्होंने विष्णु भक्त पुजारी हरिनाथ को चुना। अगले दिन वे वेश बदलकर मंदिर के द्वार पर बैठ गईं। पूजा के बाद लौटते समय लक्ष्मीजी ने हरिनाथ के मार्ग में सोने की मोहरों से भरा एक खोखला बांस रख दिया। ज्येष्ठा ने उसे स्पर्श कर अपना प्रभाव दिखाने की बात कही।
हरिनाथ ने बांस उठाया और सोचा कि घर में काम आ जाएगा। रास्ते में एक लड़के ने चारपाई के लिए वही बांस माँगा। पंडित ने उसे चवन्नी लेकर दे दिया। बाद में लड़के ने बांस भारी बताकर लौटा दिया। इस बीच डोलची में रखी चवन्नी एक चरवाहे के लड़के ने उठा ली, पर उसके पिता ने ईमानदारी से वह चवन्नी लौटाई। अंततः बांस फिर हरिनाथ के पास आ गया।
घर के निकट पहुँचते समय ज्येष्ठा क्रोधित हो उठीं। उन्होंने साँप का रूप धारण कर हरिनाथ पर आक्रमण किया। भयभीत होकर हरिनाथ ने वही बांस साँप पर दे मारा। बांस टूटते ही उसमें भरी मोहरें बिखर गईं और साँप घायल होकर भाग गया। हरिनाथ आश्चर्यचकित रह गया और लक्ष्मी माता का जयघोष करने लगा।
लक्ष्मीजी ने ज्येष्ठा से पूछा, “अब तो समझीं कि बड़प्पन किसमें है?” ज्येष्ठा मौन रहीं।
संदेश स्पष्ट था-सच्ची श्रेष्ठता छीनने में नहीं, देने में होती है।
