
■ सूर्यकांत उपाध्याय
महाराज सत्राजित का भगवान भास्कर के प्रति स्वाभाविक अनुराग था। उनके नेत्र कमल तो दिन में भगवान सूर्य को निहारते रहते थे, पर सत्राजित की मनरूपी आंखें उन्हें दिन-रात स्मरण करती रहती थीं।
भगवान सूर्य की कृपा से महाराज को अत्यंत समृद्ध राज्य प्राप्त हुआ था। वे अपने राज्य को स्नेह भरी दृष्टि से निहारते रहते थे। उन्हें इतना वैभव मिला था कि लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे और स्वयं महाराज भी इस कृपा को देखकर विस्मित होते थे।
इसी आश्चर्य ने उनके मन में जिज्ञासा जगाई कि ऐसा कौन-सा पुण्य कर्म है, जिसके कारण उन्हें यह वैभव प्राप्त हुआ। यदि उस पुण्य का रहस्य ज्ञात हो जाए, तो भविष्य में भी वैसा ही सत्कर्म कर यह सौभाग्य बनाए रखा जा सके।
इस उद्देश्य से उन्होंने ऋषि-मुनियों की एक सभा बुलाई। उसी अवसर पर महारानी विमलवती ने भी महाराज से कहा, “नाथ! मैं भी जानना चाहती हूं कि ऐसा कौन-सा शुभ कर्म था, जिसके फलस्वरूप मुझे आपके जैसी पति की प्राप्ति हुई।”
सभा में महाराज ने विनम्रता से महर्षियों से प्रश्न किया कि पूर्व जन्म में वे और उनकी पत्नी कौन थे और किन कर्मों के कारण उन्हें यह वैभव, रूप और तेज प्राप्त हुआ।
तब महर्षि परावर्तन ने ध्यान लगाकर कहा कि पूर्व जन्म में महाराज सत्राजित एक साधारण व्यक्ति थे और महारानी उसी समय उनकी पत्नी थीं। उस समय उनका स्वभाव कठोर था और पापों के कारण वे गंभीर रोग से ग्रस्त हो गए थे। उस कठिन समय में भी उनकी पत्नी ने अत्यंत निष्ठा और प्रेम से उनकी सेवा की।
बाद में दोनों ने एक सूर्य मंदिर में सेवा का कार्य आरंभ किया। वे मंदिर की सफाई, लीपाई-पोताई करते और शेष समय पुराणों के श्रवण में बिताते। एक दिन मंदिर का दीपक बुझ गया तो महाराज ने अपने भोजन का तेल दीपक में डाल दिया और उनकी पत्नी ने अपनी साड़ी फाड़कर बत्ती बना दी।
महर्षि ने बताया कि उसी निस्वार्थ सेवा और सूर्य आराधना के पुण्य फलस्वरूप उन्हें इस जन्म में वैभव, तेज और सौभाग्य प्राप्त हुआ। यही कारण है कि सूर्य भक्ति को जीवन में अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।
