■ विनीत त्रिपाठी@वाराणसी

हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी, जिसे बसियौरा पूजा के नाम से भी जाना जाता है, आस्था और परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह दिन शीतला माता की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। काशी के दशाश्वमेध घाट स्थित सिद्ध पीठ बड़ी शीतला माता मंदिर में इस वर्ष शीतला अष्टमी का पर्व विशेष श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा।
मंदिर के उपमहंत अवशेष पांडेय (कल्लू महाराज) ने बताया कि बसियौरा पूजा की तैयारियां 10 मार्च की रात से शुरू हो जाएंगी, जबकि 11 मार्च की सुबह माता का विशेष श्रृंगार, पूजा और आरती धूमधाम से संपन्न होगी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
कल्लू महाराज के अनुसार शीतला माता को रोगों और महामारियों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। मान्यता है कि माता की विधि-विधान से पूजा करने से परिवार में स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि बनी रहती है। श्रद्धालु माता से रोगों से मुक्ति और परिवार के कल्याण की कामना करते हैं।
शीतला अष्टमी के दिन विशेष रूप से महिलाएं अपनी संतानों की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत रखती हैं। वे माता शीतला की पूजा कर उनसे बच्चों की रक्षा और उन्नति का आशीर्वाद मांगती हैं।
इस पर्व की एक विशेष परंपरा यह भी है कि इस दिन माता को ठंडे या बासी भोजन का भोग लगाया जाता है, जिसे ‘बसियौरा’ कहा जाता है। श्रद्धालु एक दिन पहले बने भोजन को माता को अर्पित कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार और समाज में एकता, श्रद्धा और पारंपरिक संस्कृति को भी मजबूत करता है। शीतला अष्टमी का त्योहार लोगों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना का प्रतीक माना जाता है।
