■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक राजा था। उसे कुष्ठ रोग हो गया था। वैद्यों ने कहा कि पास के सरोवर से हंसों को मारकर बनाई गई दवा से ही आपका रोग ठीक हो सकता है।
पास के उस सरोवर के समीप साधु-महात्माओं का निरंतर आवागमन होता रहता था। इस कारण वहाँ के हंसों में भी भक्ति का भाव प्रकट हो गया था।
वे हंस संत-वैष्णव वेश (तिलक, तुलसी और मुख में हरिनाम) का बड़ा आदर करते थे।
एक दिन राजा की आज्ञा से चार सैनिक (बधिक) हंसों को पकड़ने के लिए मानसरोवर पर गए, परंतु हंस उन्हें देखकर उड़ जाते थे। सैनिकों ने देखा कि जब कोई साधु-संत हंसों के पास जाते हैं, तब वे नहीं डरते। इस रहस्य को जानकर चारों सैनिक वैष्णव वेश बनाकर फिर मानसरोवर पर गए। हंसों ने वैष्णव वेश देखकर भी यह जान लिया कि ये सैनिक (बधिक) ही हैं और उनका वेश बनावटी है, परंतु वैष्णव वेश के प्रति आदर और निष्ठा के कारण उन्होंने स्वयं को बंधने दिया। सैनिक हंसों को लेकर राजा के पास आ गए।
हंसों की संत-वेश निष्ठा देखकर श्री भगवान कृष्ण ने वैद्य का स्वरूप धारण किया और राजा के नगर में जाकर घोषणा की कि मैं कुष्ठ आदि सभी असाध्य रोगों की सफल चिकित्सा जानता हूँ। लोग उन्हें राजा के पास ले आए।
श्री कृष्ण भगवान ने कहा, आप इन पक्षियों को छोड़ दें, मैं आपको अभी पूर्णत: निरोग कर देता हूँ।
राजा ने कहा, ये पक्षी बड़ी कठिनाई से हमें मिले हैं। पहले आप मेरा रोग ठीक कर दें, तब मैं इन्हें जाने दूँगा।
यह सुनकर वैद्यजी (भगवान श्री कृष्ण) ने अपनी झोली से औषधि निकाली और उसे पिसवाकर राजा के शरीर पर मलवा दी। राजा का कुष्ठ रोग दूर हो गया। राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने हंसों को मुक्त कर दिया।
इस घटना को देखकर सैनिकों ने अपने मन में विचार किया कि जिस वैष्णव वेश पर पक्षियों ने इतना विश्वास किया और उसी के कारण उनके प्राण भी बच गए, ऐसे पवित्र वेश को हम मनुष्य होकर अब कैसे छोड़ दें!
इस प्रकार वे सैनिक सच्चे संत बन गए। उन्होंने कभी इस वेश का त्याग नहीं किया और उनकी बुद्धि भगवान की भक्ति में मग्न हो गई।
श्री नाभादास गोस्वामी के मतानुसार हमें सभी वैष्णव वेश धारण करने वालों को भक्त मानकर उनका आदर करना चाहिए। जिन व्यक्तियों में वैष्णव वेश अथवा भक्ति के कोई बाहरी चिन्ह दिखाई नहीं पड़ते, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि उनमें भक्ति अभी प्रकट नहीं हुई है, वह भीतर छिपी हुई है। क्योंकि यदि किसी व्यक्ति में बाहरी रूप से भक्ति के चिन्ह (तिलक, तुलसी, हरिनाम) न भी हों, पर वह भीतर से भक्त हो, तो उसका अनादर करने से भक्ति की हानि हो सकती है।
इसीलिए समस्त जीवों को भगवान का अंश मानकर उनका सम्मान करना चाहिए।
