■ सूर्यकांत उपाध्याय

पिता पहले बहुत परेशान रहते थे। उन्हें ठीक से नींद नहीं आती थी, उनका शरीर थका रहता था। वे चिड़चिड़े हो गए थे और बात-बात पर नाराज़ हो जाते थे। हर समय कोई न कोई बीमारी उन्हें घेरे रहती थी। पर एक दिन सब कुछ बदल गया।
एक दिन माताजी बोलीं, “मैं एक महीने के लिए मायके जाऊँगी, परिवार के साथ थोड़ा समय बिताऊँगी।”
पिता ने शांत स्वर में कहा, “ठीक है।”
लड़के ने कहा, “पिताजी, मेरी पढ़ाई में बहुत परेशानी चल रही है।”
पिता बोले, “कोई बात नहीं बेटा, सुधार हो जाएगा। नहीं हुआ तो साल दोहराना पड़ेगा, लेकिन फीस तुम्हें खुद देनी होगी।”
बेटी ने कहा, “पिताजी, कार का एक्सीडेंट हो गया।”
पिता बोले, “कोई बात नहीं, गाड़ी मैकेनिक को दिखाओ, खर्च का अंदाज़ा लगाओ और खुद व्यवस्था करो। जब तक ठीक नहीं होती, बस या मेट्रो से चलो।”
बहन बोली, “भैया, मैं कुछ महीने आपके घर रहना चाहती हूँ।”
पिता ने सहजता से कहा, “ठीक है, बैठक में रह लो। अलमारी में रजाई-कंबल हैं, निकाल लो।”
हम सब अचंभित थे, क्या ये वही पिता हैं? हमें लगा कि पिताजी किसी डॉक्टर से मिलकर आए हैं और कोई दवा ले रहे हैं, जैसे “अब मुझे फ़र्क नहीं पड़ता” नाम की कोई चमत्कारी गोली! हमने एक पारिवारिक बैठक बुलाई।
पिताजी ने शांत भाव से कहा, “मैं वर्षों तक यह सोचता रहा कि मेरी चिंता से तुम्हारी समस्याएँ हल हो जाएँगी, पर यह मेरा मोह था। हर व्यक्ति अपने कर्मों का स्वामी है। मैं पिता हूँ, ईश्वर नहीं। अब मैंने स्वीकार किया है कि मेरा धर्म अपने मन को शांत रखना है और सबको उनके कर्मों के अनुसार जीने देना है।”
उसी दिन से घर में परिवर्तन आ गया और सभी ने अपनी जिम्मेदारियाँ स्वयं संभाल लीं।
