■ सूर्यकांत उपाध्याय

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था…
इसलिए वह बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था। यह वही माँ थी, जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब आर्थिक रूप से स्वतंत्र बेटा, पिता के कई बार समझाने पर भी उन्हें अनदेखा कर देता और कहता, “यही तो उम्र है शौक की, खाने-पहनने की। जब आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आँत ही नहीं रहेगी, तो क्या करूँगा?”
बहू खुशबू भी भरे-पूरे परिवार से आई थी, इसलिए वह बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी, तो उसका मित्र-वृत्त भी उसी हिसाब से आधुनिक था। वह अक्सर बहू से पुराने शैली के कपड़े छोड़कर आधुनिक बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती…
वह कहता, “कमाल करती हो तुम! आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है। मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ? तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ, और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। ‘क्वालिटी लाइफ’ क्या होती है, तुम्हें मालूम ही नहीं।”
और बहू कहती, “क्वालिटी लाइफ क्या होती है, यह मुझे जानना भी नहीं है, क्योंकि जीवन की गुणवत्ता क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।”
आज अचानक पापा आई.सी.यू. में भर्ती हुए थे। उन्हें हृदयाघात आया था। डॉक्टर ने पर्चा थमाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था, मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा सोच रहा था कि अब क्या करे।
उसने कई दोस्तों को फोन किया कि उसे मदद की ज़रूरत है, मगर किसी ने कोई न कोई बहाना बना दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था। तभी खुशबू खाने का टिफिन लेकर आई और बोली, “अपना ख्याल रखना भी ज़रूरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो। बाबूजी को कुछ नहीं होगा, आप चिंता मत करो। कुछ खा लो, फिर पैसों का इंतज़ाम भी तो करना है। मैं यहाँ बाबूजी के पास रुकती हूँ, आप खाना खाकर पैसों का इंतज़ाम कीजिए।”
पति की आँखों से टप-टप आँसू झरने लगे।
“कहा न, आप चिंता मत कीजिए। जिन दोस्तों के साथ आप आधुनिक पार्टियाँ करते हैं, आप उन्हें फोन कीजिए। देखिए तो सही, कौन-कौन मदद को आता है।” पति खामोश और सूनी निगाहों से ज़मीन की तरफ देख रहा था। तभी खुशबू का हाथ उसकी पीठ पर आया और वह उसे सहलाने लगी।
“सबने मना कर दिया, खुशबू। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया। आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक ही है, जब तक जेब में पैसा है। किसी ने भी हाँ नहीं कहा, जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिए।”
“इसी दिन के लिए बचाने को तो माँ-बाबा कहते थे। खैर, कोई बात नहीं। आप चिंता न करें, सब ठीक हो जाएगा। कितना जमा कराना है?”
“अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है… आखिर चिंता कैसे न करूँ, खुशबू?”
“तुम्हारी ख़्वाहिशों को मैंने संभाल रखा है।”
“क्या मतलब…?”
“तुम जो नई-नई तरह के कपड़ों और दूसरी चीज़ों के लिए मुझे पैसे देते थे, वह सब मैंने संभाल कर रखे हैं। माँजी ने फोन पर बताया था कि तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे, बाकी मैंने अपने भैया से मँगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ एक ही डिब्बे में खाना है, बाकी में पैसे हैं।”
खुशबू ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।
“खुशबू! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो। मैं तुम्हें आधुनिक बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था, मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े। आज वही काम आए हैं।”
सामने बैठी माँ की आँखों में आँसू थे। आज उन्हें अपने नहीं, बल्कि बहू के संस्कारों पर नाज़ था। वह बहू के सिर पर हाथ फेरते हुए ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करने लगीं।
