■ 2000 वर्ष पुरानी रोमन दीवारें आज भी अडिग

● मुंबई
आज के दौर में गगनचुंबी इमारतें और विशाल पुल आधुनिक इंजीनियरिंग का प्रतीक माने जाते हैं, पर विडंबना यह है कि इनमें से कई संरचनाएं 50 वर्षों के भीतर ही क्षरण के संकेत देने लगती हैं। इसके विपरीत, 2000 वर्ष पुराने रोमन मंदिर और समुद्री दीवारें आज भी मजबूती से खड़ी हैं। यह अंतर केवल समय का नहीं, तकनीक और दृष्टि का भी है।
लंबे समय तक वैज्ञानिकों को यह भ्रम था कि रोमन कंक्रीट में दिखाई देने वाले सफेद खनिज कण खराब मिश्रण का परिणाम हैं। लेकिन Massachusetts Institute of Technology और Harvard University के शोध ने इस धारणा को बदल दिया। शोध के अनुसार, रोमन निर्माण में ‘लाइम क्लास्ट’ का उपयोग जानबूझकर किया जाता था, जो कंक्रीट को स्व-उपचार (self-healing) की क्षमता प्रदान करता था।
जब रोमन संरचनाओं में दरार पड़ती है, तो पानी भीतर प्रवेश कर इन लाइम क्लास्ट को घोलता है। इसके बाद यह घुला हुआ पदार्थ पुनः क्रिस्टल बनाकर दरारों को भर देता है। यह प्रक्रिया 3 से 6 महीनों में पूरी हो जाती है, जिससे संरचना फिर से मजबूत हो जाती है।
इसके विपरीत, आधुनिक कंक्रीट में इस प्रकार की लचीलापन और रासायनिक सक्रियता का अभाव है। इसमें मजबूती के लिए स्टील रॉड (रीबार) का उपयोग किया जाता है, जो पानी के संपर्क में आने पर जंग खा जाती है। जंग लगने से लोहे का आयतन बढ़ता है, जिससे कंक्रीट के भीतर दबाव बनता है और वह टूटने लगता है।
रोमन कंक्रीट की विशेषता इसका मुख्य घटक ज्वालामुखीय राख (पोज़ोलान) और क्विक लाइम है। यह मिश्रण हजारों वर्षों तक रासायनिक रूप से सक्रिय रहता है और समय के साथ और अधिक मजबूत होता जाता है।
समुद्री निर्माण में भी रोमन तकनीक अद्भुत थी। समुद्री पानी और ज्वालामुखीय राख की प्रतिक्रिया से ‘एल्यूमिनस टोबरमोराइट’ नामक दुर्लभ खनिज बनता है, जो कंक्रीट को और सुदृढ़ करता है। Lawrence Berkeley National Laboratory के अनुसार, यह खनिज समय के साथ बढ़ता रहता है, जिससे संरचना और मजबूत होती जाती है।
स्पष्ट है कि जहां आधुनिक कंक्रीट समय के साथ कमजोर होता है, वहीं रोमन निर्माण तकनीक समय के साथ स्वयं को मजबूत बनाती है, यही कारण है कि प्राचीन रोमन धरोहरें आज भी अडिग खड़ी हैं।
(साभार- टीओआई)
