■ सूर्यकांत उपाध्याय

राम-रावण युद्ध की तैयारी का पूरा दृश्य एक पेड़ पर बैठी एक गिलहरी देख रही थी। रावण की अनीति और सीता-हरण की कथा भी उसने सुन रखी थी। इस धर्मयुद्ध में वह राम की विजय के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी।
किन्तु केवल सद्भाव और प्रार्थना ही पर्याप्त नहीं होते, सत्प्रयोजन के लिए पुरुषार्थ भी आवश्यक है। जब रीछ और वानर अपनी जान की बाज़ी लगा रहे थे, तब गिलहरी ने सोचा कि उसे भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कुछ करना चाहिए। यही विचार उसके मन में बार-बार उठ रहा था।
सीता को रावण के हाथों से छुड़ाने के लिए गिद्ध जटायु अपने प्राण न्योछावर कर चुका था। वह जानता था कि रावण उससे अधिक शक्तिशाली है, फिर भी उसने कायरता नहीं दिखाई। अन्याय को सहते रहने की अपेक्षा उससे लड़ना ही उसने उचित समझा और अंततः युद्ध करते हुए अपने प्राण दे दिए।
यह आदर्श गिलहरी के मन को भा गया। उसने निश्चय किया कि वह भी इस धर्मयुद्ध में अपना योगदान अवश्य देगी, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो। उसे एक उपाय सूझा-समुद्र को उथला बनाने के लिए वह बालू लाकर उसमें डालने लगी। वह अपने शरीर पर रेत लपेटती और उसे समुद्र में झाड़ देती। साधन सीमित थे, शरीर छोटा था, पर उसका साहस अडिग था।
उसका यह प्रयास देखकर राम की दृष्टि उस पर पड़ी। वे उसके पुरुषार्थ से प्रसन्न हुए। उन्होंने स्नेहपूर्वक उसे उठाकर अपनी हथेली पर बैठाया और उसकी पीठ सहलाने लगे। गिलहरी ने स्वयं को धन्य समझा।
कहा जाता है कि राम के स्पर्श से उसकी पीठ पर जो रेखाएँ बनीं, वे आज भी उसके वंश में दिखाई देती हैं, जो निष्ठा, साहस और धर्म के प्रति समर्पण का प्रतीक हैं।
