■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन मेरे पास एक दंपत्ति अपनी छह साल की बच्ची को लेकर आए। निरीक्षण के बाद पता चला कि उसके हृदय में रक्त संचार बहुत कम हो चुका है।
मैंने अपने साथी डॉक्टर से विचार-विमर्श करने के बाद उस दंपत्ति से कहा, “बचने की संभावना मात्र 30 प्रतिशत है। दिल को खोलकर ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ेगी, अन्यथा बच्ची के पास केवल तीन महीने का समय है।”
माता-पिता भावुक होकर बोले, “डॉक्टर साहब! यह हमारी इकलौती बिटिया है। ऑपरेशन के अलावा कोई और चारा नहीं है।”
मैंने अन्य किसी विकल्प से इंकार कर दिया।
दंपत्ति ने कहा, “आप ऑपरेशन की तैयारी कीजिए।”
सर्जरी के पाँच दिन पहले बच्ची को भर्ती कर लिया गया। वह मुझसे बहुत घुल-मिल गई थी और प्यारी-प्यारी बातें करती थी। उसकी माँ को प्रार्थना में अटूट विश्वास था। वह सुबह-शाम बच्ची से कहती, “बेटी, घबराना नहीं। भगवान बच्चों के हृदय में रहते हैं, वे तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।”
सर्जरी के दिन मैंने बच्ची से कहा, “बेटी, चिंता मत करना। ऑपरेशन के बाद तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी।”
बच्ची ने कहा, “डॉक्टर अंकल, मैं बिल्कुल नहीं डर रही, क्योंकि मेरे हृदय में भगवान रहते हैं। पर आप जब मेरा हार्ट ओपन करोगे, तो देखकर बताना कि भगवान कैसे दिखते हैं?”
मैं उसकी बात पर मुस्कुरा उठा।
ऑपरेशन के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि कुछ नहीं हो सकता। बच्ची को बचाना असंभव था। उसके दिल में खून का एक कतरा भी नहीं पहुँच रहा था। निराश होकर मैंने अपने साथी डॉक्टर से दिल को वापस सिलने का निर्देश दिया।
तभी मुझे बच्ची की आखिरी बात याद आई और मैं अपने रक्त-सने हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा, “हे ईश्वर! मेरा सारा अनुभव इस बच्ची को बचाने में असमर्थ है, पर यदि आप इसके हृदय में विराजमान हैं, तो आप ही कुछ कीजिए।”
मेरी आँखों से आँसू टपक पड़े। यह मेरी पहली अश्रुपूर्ण प्रार्थना थी। तभी मेरे जूनियर डॉक्टर ने मुझे हल्का सा संकेत किया। मैं चमत्कार में विश्वास नहीं करता था, पर यह देखकर स्तब्ध रह गया कि दिल में रक्त संचार पुनः शुरू हो गया।
मेरे 60 वर्षों के जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था। ऑपरेशन सफल हो गया, और मेरा जीवन भी बदल गया। होश में आने पर मैंने बच्ची से कहा, “बेटा, हृदय में भगवान दिखे तो नहीं, पर यह अनुभव अवश्य हो गया कि वे हर पल हमारे भीतर मौजूद रहते हैं।”
इस घटना के बाद मैंने अपने ऑपरेशन थिएटर में प्रार्थना का नियम शुरू कर दिया। मेरा विनम्र अनुरोध है कि सभी अपने बच्चों में प्रार्थना का संस्कार अवश्य डालें।
