■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

भूपेंद्र मिश्र का पहला कविता संग्रह है “महसूस”। इसे न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, इंद्रपुरी, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। ध्यान रहे कि पिछले कुछ समय से न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन बेहतरीन साहित्यिक कृतियों के प्रकाशन में अग्रणी नाम बन गया है। “महसूस” में कवि भूपेंद्र मिश्रा की 58 कविताएं हैं। जीवन व समाज से जुड़ी तकरीबन सभी सकारात्मक स्थितियों की सामाजिक विसंगतियों की आधुनिक जीवन के संघर्षशील जिजीविषाओं की और कोमल मानवीय संवेदनाओं की कविताएं हैं।
कवि भूपेंद्र मिश्र मूल रूप से उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के निवासी हैं और वह पिछले 57 सालों से मुंबई में हैं। उन्होंने कविता लिखना तो स्कूल के दिनों से ही शुरू कर दिया था लेकिन उनकी काव्यात्मक प्रतिभा को पंख मुंबई में लगे। भूपेंद्र मिश्रा का कहना है कि, “मेरे लिए लिखना महज अपनी महसूस की अभिव्यक्ति और आत्मविकास का जरिया रहा। बिना किसी राजनीतिक एजेंडे या छिपी हुई मंशा के। हां एक सामान्य जीवन जीते, यह महसूस औरों के भी महसूस से मेल खाता चलता है और मेरा लिखा यदि किसी काम आता है, किसी को दिलासा देता है, किसी में उत्साह भरता है, किसी को आइना दिखा पाता है, किसी को छू लेता है या किसी के जीवन में नाखून बराबर ही सही फर्क ला पाए तो ये कविताओं के मर्म को जरूर पूरा करेगा और मुझे भी संतोष और खुशी देगा।”
“महसूस” में जो कविताएं कवि ने समाहित की हैं उनमें पगडंडियां, एनीमेशन, अंकिता, इकतीस दिसंबर, कठपुतलियां, इंसान, इंस्टॉलमेंट, कविताएं, कोरोना, खख, कहां छिपोगे, खुशी के आंसू, उम्र, जानता हूं, जो बच गया है, गिद्ध, उसने कहा था, क्या करोगे ख्याल, ट्रांसफार्मेशन, झूठ, तारतम्य, दो लाइनें, हम पर लदा है.., पता नहीं क्यों, पहचान, असहाय, पानी, पापा, बाजार, बेटी, भीड़, बहते रहें, रॉकेट में पढ़ी जाएगी कविताएं, युद्ध, शुची, वक्त, वक्त के आसमान में, सांस, शर्त, भूल, हंसी, वोट, मन, एक रोज, वक्त, वो सांसें, शर्मिंदा हूं बेटियों…, पूर्वज, अंतिम जरूरतें, महसूस तथा मृत्यु से बचा हुआ कविताएं हैं।
कवि ‘कोरोना’ कविता में लिखता है- एक साँस भर हवा, छूट गई थी/ कहीं किसी प्रयोगशाला की हवा में, जैसे जादूगरनी बुढ़िया/ की डिबिया/ खुल भर गई हो, बूढ़े बाबा की चुनौटी/ बिखर भर गई हो…. और घुल गई हो दुनिया के हर किसी की साँसों में.. मौत।
कवि की एक और कविता ‘ट्रांसफॉर्मेशन’ में संवेदनशील भावनाओ की गहराई देखें- कानों में पड़ा वो/ पिघले हुए काँच की मानिंद, तड़क कर… उतर गया जेहन में… उतर गया हृदय तलक… जैसे पढ़ी हो कोई कविता…. जैसे समझ पड़ गई अपनी कोई दीवार… जो आज तलक नहीं हो पाई थी पार/ कि जैसे छोटे से बदली के टुकड़े ने/ भिगो दिया हो पूरा संसार… समझ आ गई असीम ताकत की बांधी हुई सीमाएं… कि खुल गया कोई दरवाजा/ संसार की खूबसूरती और असीमितता की ओर…. एक चींटी निकल पड़ी…
कवि भूपेंद्र मिश्र के अनुसार “मैंने जो ‘महसूस’ किया, उसे ही कविता के रूप में कागज पर उतार दिया।” उनकी ‘वक्त’ कविता एक जरुरी साफगोई है- मेरा चलना-चलते रहना तो तय है मगर, वक्त सुस्ता ले जरा थक गया हो गर… तेरी हमकदमी में मैं दूर निकल आया हूँ, गुदगुदे दिल को भी लोहा-सा बना पाया हूँ…। बहुत मुश्किल गुजरा आँखों की नदी सूखना… बहुत मुश्किल गुजरा पाँखों से हवा रूठना, चलो अफसोस पर अब थोड़ी सी मिट्टी डालें… चलो कल के जश्न की थोड़ी तैयारी कर लें… मेरा चलना-चलते रहना तो तय है मगर, वक्त सुस्ता ले जरा थक गया हो गर…
कवि भूपेंद्र मिश्र की कृति “महसूस” कविता के गंभीर पाठकों के लिए उपयोगी सिंद्ध होगी, ये मेरा विश्वास है। 128 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य 225 रुपए है।
