■ सूर्यकांत उपाध्याय

रुद्र और मीरा की शादी को पचास साल पूरे हो चुके थे। दोनों अब सफ़ेद बालों और झुर्रियों के बावजूद एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। सुबह की चाय से लेकर रात की दवाई तक सब कुछ रुद्र के बिना मीरा अधूरा मानती थी, और मीरा के बिना रुद्र का तो जीना ही मुश्किल था।
एक दिन पार्क की बेंच पर बैठे रुद्र ने कहा, “मीरा, सोचता हूँ, अगर मैं पहले चला गया तो तुम्हें बैंक का रास्ता कौन बताएगा?”
मीरा मुस्कुरा दी, लेकिन उसकी आँखों में हल्की नमी थी, “और अगर मैं पहले चली गई, तो तुम्हारी इलायची वाली चाय कौन बनाएगा, रुद्र?”
उस दिन से दोनों ने तय किया, अब जीवन के अंत की भी तैयारी करनी होगी, उसी अपनत्व और हँसी के साथ।
रुद्र ने मीरा को बैंक, एटीएम, गैस एजेंसी और बिल भरने के तरीके सिखाने शुरू किए।
मीरा ने भी रुद्र को दाल-चावल और खिचड़ी बनाना सिखाया।
कभी रुद्र रसोई में मसाले ज़्यादा डाल देता, तो मीरा हँसकर कहती- “अब तुम्हें तो शेफ बनना पड़ेगा।”
और कभी मीरा पासबुक में गलत एंट्री कर देती, तो रुद्र कहता -“चलो, अब तो तुम बैंकर बन ही गईं।”
धीरे-धीरे दोनों ने जीवन को एक “आनंदाश्रम” बना दिया-
जहाँ उम्र का हर दिन, हर पल एक उत्सव बन गया।
सुबह मंदिर, दोपहर टीवी सीरियल, शाम पार्क की सैर और रात को पुराने गाने।
रुद्र अक्सर कहता-“मीरा, अब मौत का डर नहीं लगता। हमने सब सीख लिया है, सब बाँट लिया है।”
मीरा मुस्कुराकर कहती-“अब जो भी पहले जाए, दूसरे को डर नहीं रहेगा, बस यादें रहेंगी।”
एक सुबह रुद्र ने मीरा के लिए वही इलायची वाली चाय बनाई, बिस्कुट रखे और कहा-“चलो, आज बैंक चलते हैं।”
मीरा ने मुस्कुराकर कप लिया और बोली- “अब सब आता है, कहीं जाने की जल्दी नहीं।”
शाम को जब मीरा ने वही चाय रुद्र के लिए बनाई,
वह बेंच पर बैठे-बैठे मुस्कुरा रहा था-
मानो कह रहा हो, “अब मैं निश्चिंत हूँ, अब तुम सब जानती हो…”
मीरा ने उसके कंधे को छुआ। वह जा चुका था। शांत, मुस्कुराता हुआ, जैसे पका पत्ता हवा में झूमकर धरती से मिल गया हो।
मीरा की आँखों से आँसू बहे, मगर चेहरा शांत था।
वह जानती थी, रुद्र चला गया, लेकिन उसने उसे जीवन जीने का सबसे सुंदर तरीका सिखा दिया था-
“जीवन के हर पड़ाव को प्रेम, तैयारी और आनंद से अपनाना।”
और उस दिन से मीरा का घर सचमुच “आनंदाश्रम” बन गया-
जहाँ हर याद, हर वस्तु, हर सुगंध रुद्र के प्रेम की तरह बस गई थी।
