■ सूर्यकांत उपाध्याय

संत मलूकदास जी कर्मयोगी संत थे। स्वाध्याय, सत्संग और भ्रमण से उन्होंने जो व्यावहारिक ज्ञान अर्जित किया था, वह केवल पुस्तकीय ज्ञान से कहीं अधिक गहरा था। आरंभ में वे नास्तिक प्रवृत्ति के थे। एक बार उनके गांव में एक संत आए, जो प्रतिदिन रामकथा सुनाते थे। गांव के लोग श्रद्धा से कथा सुनने पहुंचते थे। संयोग से एक दिन मलूकदास भी वहां जा पहुंचे।
कथा के दौरान संत ने कहा, “श्रीराम संसार के सबसे बड़े दाता हैं। वे भूखों को अन्न और जरूरतमंदों को सहारा देते हैं।” यह सुनकर मलूकदास ने प्रश्न किया, “यदि मैं कोई काम न करूं और केवल राम का नाम लूं, तब भी क्या भोजन मिलेगा?” संत ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “निश्चय ही मिलेगा।”
सत्य की परीक्षा लेने के लिए मलूकदास घने जंगल में जाकर एक पेड़ पर बैठ गए। दिन बीत गया, रात हो गई, पर भोजन नहीं मिला। अगले दिन कुछ राजकीय अधिकारी वहां पहुंचे और भोजन निकालने ही वाले थे कि शेर की दहाड़ सुनकर सब भोजन छोड़कर भाग गए। मलूकदास यह देखकर चकित रह गए, मगर वे स्वयं नीचे उतरकर भोजन करने को तैयार नहीं हुए।
कुछ देर बाद डाकुओं का दल वहां आया। भोजन देखकर उन्हें संदेह हुआ कि कहीं इसमें विष न मिला हो। खोजबीन में उनकी नजर पेड़ पर बैठे मलूकदास पर पड़ी। डाकुओं के सरदार ने उन्हें नीचे बुलाया और भोजन चखने को मजबूर किया। भयवश मलूकदास ने भोजन कर लिया।
इसके बाद उन्होंने पूरी घटना डाकुओं को बताई। तब उन्हें अनुभव हुआ कि प्रभु की कृपा अद्भुत होती है। वे स्वयं भोजन से दूर रहना चाहते थे, फिर भी ईश्वर ने उन्हें भोजन करा दिया। इस घटना के बाद मलूकदास श्रीराम के अनन्य भक्त बन गए।
