■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार की बात है। एक कक्षा में गुरुजी अपने सभी छात्रों को समझाना चाहते थे कि प्रकृति सभी को समान अवसर देती है और उन अवसरों का सदुपयोग करके व्यक्ति अपना भाग्य स्वयं बना सकता है।
इसी बात को अच्छी तरह समझाने के लिए गुरुजी ने तीन कटोरे लिए। पहले कटोरे में एक आलू रखा, दूसरे में अंडा और तीसरे में चाय की पत्ती डाल दी।
अब तीनों कटोरों में पानी डालकर उन्हें गैस पर उबलने के लिए रख दिया।
सभी छात्र यह सब हैरानी से देख रहे थे, लेकिन किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। बीस मिनट बाद जब तीनों बर्तनों में उबाल आने लगा, तो गुरुजी ने सभी कटोरों को नीचे उतारा और आलू, अंडा तथा चाय को बाहर निकाला।
अब उन्होंने सभी छात्रों से तीनों कटोरों को ध्यान से देखने के लिए कहा, लेकिन तब भी किसी छात्र को कुछ समझ नहीं आया।
आखिर में गुरुजी ने एक बच्चे से आलू, अंडा और चाय को स्पर्श करने के लिए कहा। जब छात्र ने आलू को हाथ लगाया, तो उसने पाया कि जो आलू पहले काफी कठोर था, वह पानी में उबलने के बाद बहुत मुलायम हो गया था।
फिर छात्र ने अंडे को उठाया। उसने देखा कि जो अंडा पहले बहुत कोमल था, उबलने के बाद वह कठोर हो गया है। अब बारी थी चाय के कप को उठाने की।
जब छात्र ने चाय के कप को उठाया, तो उसने देखा कि चाय की पत्ती ने गर्म पानी के साथ मिलकर अपना स्वरूप बदल लिया था और अब वह चाय बन चुकी थी।
तब गुरुजी ने समझाया, “हमने तीन अलग-अलग चीजों को समान परिस्थिति से गुजारा, यानी तीनों को समान रूप से पानी में उबाला, लेकिन बाहर आने पर तीनों एक जैसी नहीं रहीं।
आलू, जो पहले कठोर था, नरम हो गया। अंडा, जो पहले कोमल था, कठोर बन गया और चाय की पत्ती ने अपना रूप ही बदल लिया। ठीक इसी प्रकार यह बात इंसानों पर भी लागू होती है।
सभी को समान अवसर मिलते हैं और कठिनाइयां भी आती हैं, लेकिन यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि आप आई हुई परेशानियों का सामना कैसे करते हैं और कठिन समय से निकलने के बाद क्या बनते हैं।”
