■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

महाराष्ट्र कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी तथा महाराष्ट्र सरकार के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव सतीश त्रिपाठी लिखित सरयू से सागर तक एक सामान्य आत्मकथा की बजाय कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी के खट्टे-मीठे अनुभवों की दास्तान है। इसमें लेखक ने काफी साफगोई बरती है। लेखक के अनुभवों से कैसरुल जाफरी का यह शेर याद आता है- ‘हम तो आईने हैं, दिखाएंगे दाग चेहरों के, जिसे खराब लगे सामने से हट जाए।’
लेखक ने आईएएस अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के बीच तनातनी तथा प्रोटोकॉल तोड़ने के कई मामलों का उल्लेख किया है। साथ ही, परस्पर विश्वास के अनेक प्रसंग भी पुस्तक में दर्ज हैं। आईएएस अधिकारियों व न्यायिक अधिकारियों के बीच तनाव का एक रोचक प्रसंग भी पुस्तक में है। चंद्रपुर के कलेक्टर अरुण भाटिया तथा वहां के अतिरिक्त जज के बीच विवाद इतना बढ़ा कि जज ने भाटिया पर चोरी का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करवा दी थी।
लेखक ने ब्रह्मपुरी के एसडीओ के रूप में मृदुभाषी कलेक्टर राजगोपालन के साथ कार्य करने के कई जीवंत अनुभव दर्ज किए हैं। रत्नागिरी जिला परिषद के सीईओ के रूप में उन्हें वहां की सर्वसमावेशी संस्कृति के दर्शन हुए। बाद में वे परभणी के डीएम बने। पुस्तक में बाल मजदूरी पर शोधपूर्ण जानकारी दी गई है। इसी क्रम में ‘सेतु न्यास’ का गठन हुआ। उनके पिता पंडित परमहंस त्रिपाठी न्यास के अध्यक्ष बने। सेतु का गठन बाल श्रम, नारी उत्थान व नारी सशक्तिकरण के उद्देश्य से हुआ था। इसमें भोजपुरी के प्रचार-प्रसार को भी समाहित किया गया। बाद में विश्व भोजपुरी सम्मेलन की स्थापना हुई। पुस्तक में सेतु संस्था के कार्यों के साथ नर्मदा बचाओ आंदोलन व आदिवासी समुदाय की जिजीविषा का भी उल्लेख मिलता है।
पुस्तक में प्राक्कथन, आत्मवृत्त की ओर, मेरा कलकत्ता, भारतीय प्रशासनिक सेवा प्रशिक्षण केंद्र मसूरी, सांगली से परभणी तक, बाल श्रम एवं सेतु न्यास, सांप्रदायिक दंगे मुंबई एवं मालेगांव, विदेश यात्राएं तथा विश्व भोजपुरी सम्मेलन जैसे अध्याय शामिल हैं।
लेखक ने अपने गांव महलिया, जिला देवरिया का इतिहास, पुरखों की स्मृतियां तथा गांव के प्रति अपने अटूट प्रेम का भावपूर्ण चित्रण किया है। फुन्नी काका, नेबु राय भाँट, शुकुल मास्टर, बाबू साहब, रामदयाल जैसे पात्रों के माध्यम से गांव का जीवंत वातावरण सामने आता है। सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल देते हुए लेखक ने लिखा है कि यादन खान तथा जमुनालाल दर्जी के सहयोग से शिवमंदिर का निर्माण हुआ।
कोलकाता का क्रिकेट प्रेम, फुटबॉल प्रेम, टैगोर, रामकृष्ण परमहंस, शरतचंद्र, बंकिमचंद्र, सुभाष बाबू, कॉलेज स्ट्रीट का कॉफी हाउस तथा हिंदी हाई स्कूल का उल्लेख पुस्तक को रोचक बनाता है। लेखक ने प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीएससी व एमएससी की पढ़ाई की। वर्ष 1972 में वे आईएएस बने।
एक आईएएस अधिकारी के रूप में लेखक ने महाराष्ट्र के अनेक हिस्सों में उल्लेखनीय कार्य किए। मुंबई व मालेगांव दंगों के दौरान स्वस्थ प्रशासनिक व्यवस्था कायम करने का प्रयास किया। डेनमार्क, अमेरिका, जापान, ब्राजील, मॉरीशस, श्रीलंका सहित अनेक देशों की यात्राओं का जीवंत वर्णन भी पुस्तक में है।
कुल मिलाकर सरयू से सागर तक एक उपयोगी पुस्तक है, जिसमें बचपन, शिक्षा, प्रशासन, समाज तथा मानवीय मूल्यों से जुड़ी अनेक बातें मिलती हैं। सृष्टि प्रकाशन, कोलकाता द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के 446 पृष्ठ हैं तथा मूल्य 700 रुपए है।
