■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक गांव में शेर सिंह नाम का किसान रहता था। वह स्वभाव से अत्यंत अभिमानी और क्रोधी था। छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा कर लेता था। गांव के लोगों से ठीक से बात नहीं करता था और न किसी को प्रणाम करता था। इसी कारण गांव वाले भी उससे दूरी बनाए रखते थे।
उसी गांव में दयाराम नाम का एक किसान आकर बस गया। वह बहुत सरल, विनम्र और सहायक स्वभाव का था। गांव के सभी लोग उसका आदर करते थे और हर काम में उससे सलाह लेते थे। एक दिन गांव वालों ने दयाराम से कहा, “तुम शेर सिंह से दूर ही रहना। वह बहुत झगड़ालू है।”
दयाराम मुस्कराकर बोला, “यदि वह मुझसे झगड़ा करेगा तो मैं उसे मार डालूंगा।” यह सुनकर सब हंस पड़े, क्योंकि वे जानते थे कि दयाराम अत्यंत दयालु व्यक्ति है।
जब यह बात शेर सिंह तक पहुंची तो वह क्रोधित हो गया। उसने दयाराम को परेशान करना शुरू कर दिया। कभी वह अपने बैल उसके खेत में छोड़ देता, कभी पानी की नाली तोड़ देता। दयाराम हर बार बिना कुछ कहे नुकसान सह लेता और शांति से काम संभाल लेता।
एक दिन दयाराम के यहां लखनऊ से मीठे खरबूजे आए। उसने गांव के सभी लोगों के घर एक-एक खरबूजा भिजवाया, लेकिन शेर सिंह ने यह कहकर लौटा दिया, “मैं किसी का दान नहीं लेता।”
कुछ दिनों बाद बरसात में शेर सिंह की अनाज से भरी गाड़ी कीचड़ में फंस गई। उसके कमजोर बैल गाड़ी नहीं निकाल सके। गांव वालों ने कहा, “उसे वहीं पड़ा रहने दो।” लेकिन दयाराम अपने मजबूत बैल लेकर सहायता के लिए पहुंच गया।
शेर सिंह ने मना किया, फिर भी दयाराम ने उसके बैलों की जगह अपने बैल जोत दिए और गाड़ी बाहर निकलवा दी। यह देखकर शेर सिंह का हृदय बदल गया। उसने कहा, “दयाराम ने अपने उपकार से मेरे अहंकार को समाप्त कर दिया।”
उस दिन के बाद शेर सिंह सबके साथ प्रेम और नम्रता से रहने लगा। वास्तव में, बुराई को भलाई से जीतना ही सच्ची जीत है।
