■ सूर्यकांत उपाध्याय

बहुत समय पहले की बात है। एक शहर में एक बहुत बड़ा और समृद्ध व्यापारी रहता था। उसका कारोबार दूर-दूर तक फैला हुआ था, लेकिन उसका स्वभाव अत्यंत कठोर और लालची था। वह हमेशा दूसरों का फायदा उठाने की फिराक में रहता था।
उसी शहर के किनारे एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी छोटी-सी झोपड़ी में रहता था। वह शहर के मंदिरों और अमीर लोगों के घरों में शुद्ध देसी घी बेचने का काम करता था। व्यापारी उस बूढ़े से हर सप्ताह 5 किलो घी खरीदता था।
एक दिन व्यापारी के मन में शक पैदा हुआ। उसने सोचा, यह बूढ़ा अनपढ़ है, क्या पता यह मुझे पूरा घी देता भी है या नहीं। उसने तराजू निकाला और बूढ़े द्वारा दिए गए घी के पैकेट को तौला।
व्यापारी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, जब उसने देखा कि घी का वजन 5 किलो नहीं, बल्कि केवल 4 किलो 500 ग्राम था।
अगले दिन उसने बूढ़े को बुलाया और सबके सामने चिल्लाते हुए कहा, ओ धोखेबाज! तू मुझे इतने वर्षों से ठग रहा है? तूने मुझे 5 किलो बताकर हमेशा कम घी दिया। आज के बाद अपनी शक्ल मत दिखाना। मैं तुझ जैसे बेईमान व्यक्ति से व्यापार नहीं करूंगा।
बूढ़ा व्यक्ति बहुत विनम्र था। उसने सिर झुकाकर शांत स्वर में कहा-
साहब, मुझे माफ कर दीजिए। मैं बहुत गरीब हूँ। मेरे पास वजन तौलने के लिए बाँट खरीदने के पैसे नहीं थे। इसलिए जब भी मैं आपको घी देने आता था, तब आपने मुझे जो 5 किलो वाली चीनी की बोरी पिछले महीने दी थी, मैं उसी को तराजू के एक पलड़े पर रखकर दूसरे पलड़े में घी तौल लेता था।
पूरा बाजार सन्न रह गया। व्यापारी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। असल में, उसी व्यापारी ने एक महीने पहले बूढ़े को 5 किलो बताकर साढ़े चार किलो चीनी दी थी।
यह कथा हमें कर्म के तीन बड़े सिद्धांत सिखाती है-
- प्रतिध्वनि – जीवन एक गूंज की तरह है। आप दुनिया को जो देते हैं, वही घूमकर आपके पास वापस आता है।
- ईमानदारी का पैमाना – हम दूसरों के लिए जो पैमाना तय करते हैं, प्रकृति हमारे लिए भी वही पैमाना अपनाती है।
- धोखा स्वयं को – जब हम किसी और को धोखा देने की कोशिश करते हैं, तब वास्तव में हम अपने भविष्य और परिस्थितियों को खराब कर रहे होते हैं।
इंसान के कर्म उसके साथ साये की तरह चलते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपके साथ अच्छा हो, तो दूसरों के साथ अच्छा करना शुरू करें। आपकी आज की मेहनत और ईमानदारी ही आपके कल के सुखद कर्मफल की नींव है।
