■ सूर्यकांत उपाध्याय

तमिलनाडु के कराइकल में जन्मी पुनितवती बचपन से ही भगवान शिव की परम भक्त थीं। उनका विवाह एक धनी व्यापारी परमदत्त से हुआ था। वे एक आदर्श पत्नी थीं, लेकिन उनका मन सदैव शिव चरणों में ही रमता था।
एक दिन उनके पति ने घर पर दो आम भेजे। उसी समय एक भूखा साधु, जो स्वयं भगवान शिव का रूप थे, द्वार पर आया। पुनितवती ने श्रद्धावश एक आम उस साधु को खिला दिया। जब उनके पति भोजन करने आए और दूसरा आम मांगा, तब पुनितवती संकट में पड़ गईं। उन्होंने महादेव का स्मरण किया और चमत्कारिक रूप से उनके हाथ में एक दिव्य आम प्रकट हो गया। वह आम इतना स्वादिष्ट था कि उनके पति समझ गए कि यह कोई साधारण फल नहीं है।
जब उनके पति को पुनितवती की दिव्य शक्तियों का आभास हुआ, तो वे उनसे भयभीत हो गए और उन्हें देवी मानकर छोड़ दिया। जब पुनितवती को यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने महादेव से प्रार्थना की, “हे प्रभु! अब जब मेरे पति ने मुझे त्याग दिया है, तो मुझे इस सुंदर शरीर की आवश्यकता नहीं है। मुझे ऐसा रूप प्रदान करें कि मैं केवल आपकी भक्ति कर सकूँ।”
महादेव की कृपा से उनका सुंदर शरीर एक अस्थिपंजर जैसा हो गया। वे उसी रूप में शिव की स्तुति गाती हुई कैलाश पर्वत की ओर चल पड़ीं।
जब वे कैलाश पहुँचीं, तब उन्होंने सोचा कि महादेव की पवित्र भूमि पर पैरों से चलना पाप होगा। इसलिए वे अपने हाथों के बल पर्वत पर चढ़ने लगीं। माता पार्वती ने आश्चर्य से पूछा, “हे स्वामी! यह भयानक रूप वाली महिला कौन है, जो इस प्रकार पर्वत पर चढ़ रही है?”
तब महादेव ने बड़े गर्व और प्रेम से उत्तर दिया, “देवी, यह मेरी ‘अम्मा’ (माँ) हैं।” महादेव स्वयं उनके पास आए और उन्हें उठाकर प्रेमपूर्वक ‘अम्मा’ कहकर पुकारा। उन्होंने पुनितवती से वरदान मांगने को कहा। तब पुनितवती ने केवल यही वरदान मांगा कि वे सदा शिव के चरणों में रहकर उनकी भक्ति के गीत गाती रहें।
