■ सूर्यकांत उपाध्याय

वृन्दावन की एक शांत संध्या थी। यमुना का जल चाँदनी में चाँदी-सा चमक रहा था। कदम्ब के वृक्षों के नीचे मंद पवन बह रही थी और उस पवन में जैसे बाँसुरी की अनसुनी धुन तैर रही थी।
राधा ने महसूस किया कि यह बाँसुरी श्रीकृष्ण ने नहीं बजाई। वह धीरे-धीरे उस कुञ्ज की ओर बढ़ीं, जहाँ कृष्ण अक्सर बैठकर वंशी बजाते थे। आज वहाँ मौन था। कृष्ण शिला पर बैठे थे, पर उनकी आँखें बंद थीं, मानो किसी गहरे ध्यान में लीन हों।
राधा ने पास जाकर पूछा, ‘प्राणवल्लभ, आज वंशी क्यों मौन है ?’
कृष्ण ने आँखें खोलीं, मुस्कुराए, पर वह मुस्कान भी कुछ गहरी थी। फिर बोले, ‘राधे, आज मैं सुन रहा हूँ।’
राधा ने आश्चर्य से पूछा, ‘क्या ?’
कृष्ण बोले, ‘आज मैं तुम्हारा प्रेम सुन रहा हूँ, जो वाणी से नहीं, मौन से बोलता है।’
राधा ने धीमे स्वर में कहा, ‘मेरा प्रेम तो आप ही हैं, मैं क्या सुनाऊँगी ?’
कृष्ण ने पास आकर उनके दोनों गालों को अपने हाथों में लिया और कहा, ‘यही तो भूल है, राधे! जब तक प्रेम को ‘मैं’ और ‘तुम’ में बाँटा जाता है, वह अधूरा रहता है। जब प्रेम इतना गहरा हो जाए कि ‘मैं’ मिट जाए, तभी सच्चा मिलन होता है।’
राधा की आँखों में आँसू आ गए, पर वे विरह के नहीं, पूर्णता के आँसू थे। उन्होंने पूछा, ‘तो क्या प्रेम में मिलन ज़रूरी नहीं, प्रियतम ?’
कृष्ण ने धीरे से कहा, ‘मिलन शरीर का नहीं, भाव का होता है। जब तुम्हारा मन मेरे बिना भी मुझे ही अनुभव करे और मेरा अस्तित्व तुम्हारे बिना भी तुम्हीं में बसे, वही सच्चा मिलन है।’
इतना कहकर कृष्ण ने बाँसुरी उठाई, पर इस बार जो धुन बजी, वह केवल कानों से नहीं, हृदय से भी सुनी जा सकती थी।
राधा ने आँखें बंद कर लीं।
और उस क्षण न राधा थीं, न कृष्ण…कुछ था तो केवल प्रेम था……!
