
▪️ मुंबई
पुणे में परिवार नियोजन को लेकर सामने आई ताज़ा स्थिति ने सामाजिक सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, आज भी नसबंदी का अधिकांश बोझ महिलाओं पर ही है, जबकि पुरुषों की भागीदारी बेहद सीमित बनी हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हर 40 महिलाओं के मुकाबले केवल एक पुरुष नसबंदी के लिए आगे आता है। यह आंकड़ा न केवल लैंगिक असंतुलन को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि परिवार नियोजन को अब भी महिलाओं की जिम्मेदारी माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पुरुष नसबंदी को लेकर समाज में कई तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। अधिकांश पुरुषों को डर रहता है कि इससे उनकी शारीरिक क्षमता या कार्यक्षमता पर असर पड़ेगा, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञ इसे पूरी तरह सुरक्षित और सरल प्रक्रिया बताते हैं। इसके विपरीत, महिलाओं की नसबंदी (ट्यूबेक्टॉमी) अपेक्षाकृत जटिल होती है, जिसमें सर्जरी और रिकवरी का जोखिम शामिल रहता है।
इसके बावजूद महिलाएं बड़ी संख्या में आगे आ रही हैं, जो सामाजिक दबाव और जिम्मेदारी के असमान बंटवारे को दर्शाता है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, लेकिन अपेक्षित बदलाव अभी दूर नजर आता है।
