▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

स्कूल परिसर में ज्यों ही कलेक्टर साहब की गाड़ी ने प्रवेश किया, हड़कंप मच गया। स्कूल का पूरा स्टाफ सतर्क हो गया। कक्षा-कक्षों में अचानक शांति छा गई। सभी शिक्षक गंभीरता से पढ़ाते हुए नज़र आने लगे। प्रिंसिपल मैडम दौड़कर कलेक्टर साहब के स्वागत के लिए कार्यालय से बाहर निकल आईं। कार्यालय के सामने कुर्सी पर बैठी 59 वर्षीय चपरासी सरिता देवी जल्दबाजी में अपना नकली पैर पहनने लगीं। कलेक्टर साहब सीधे उनकी ओर बढ़ रहे थे।
उन्हें अपनी ओर आते देख सरिता देवी घबरा गईं। बिना नकली पैर पहने ही बैसाखी के सहारे एक पैर पर खड़ी हो गईं। कलेक्टर साहब उनके पास आए और अचानक घुटनों के बल बैठकर बोले, ‘अम्मा, पहचाना नहीं क्या?’
सरिता देवी ने एक हाथ से चश्मा ठीक किया, फिर कांपते स्वर में बोलीं, ‘नंदू!’
अपने मुख से अपना नाम सुनते ही कलेक्टर साहब खड़े हुए और ‘अम्मा’ कहते हुए सरिता देवी के सीने से लग गए। सारा स्टाफ इस दृश्य को चोर नज़रों से देख रहा था। प्रिंसिपल मैडम भी आश्चर्य से यह सब देख-सुन रही थीं। वे जानती थीं कि सरिता देवी की कोई संतान नहीं है। फिर यह नंदू कौन है?
कलेक्टर साहब ने सरिता देवी को कुर्सी पर बैठाया। फिर अपने हाथों से उन्हें नकली पैर पहनाते हुए बोले, ‘अम्मा, मैंने तुम्हारा सपना पूरा कर दिया। देखो, मैं कलेक्टर बनकर लौट आया हूँ।’
इसके बाद उन्होंने प्रिंसिपल मैडम की ओर देखकर कहा, ‘मैं स्कूल का निरीक्षण करने नहीं आया हूँ। मैं तो बस अपनी माँ से मिलने आया हूँ। आज मैं जो भी हूँ, इन्हीं की बदौलत हूँ। जब इनकी पोस्टिंग मेरे गाँव में थी, तब इन्होंने मेरी केवल आर्थिक सहायता ही नहीं की, बल्कि मुझे माँ का स्नेह भी दिया। रिटायरमेंट के बाद मैं इन्हें अपने साथ ही रखूँगा।’
सरिता देवी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे और वे भाव-विभोर होकर नंदू के सिर पर हाथ फेरती जा रही थीं। आज उनके मन से भगवान के प्रति सारी शिकायतें दूर हो गई थीं। भगवान ने भले ही उन्हें कोख का संतान-सुख नहीं दिया, लेकिन बुढ़ापे का सच्चा सहारा अवश्य दे दिया था।
