▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन भगवान श्री कृष्ण, बलराम और उनके ग्वाल मित्र वन में गायें चरा रहे थे। दोपहर होने पर सभी को बहुत भूख लगी। तब श्री कृष्ण ने अपने मित्रों से कहा, ‘पास में कुछ ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं। उनसे भोजन माँगकर ले आओ।’
ग्वालबाल ब्राह्मणों के पास पहुँचे और विनम्रता से बोले,
‘भगवान श्री कृष्ण और बलराम पास ही हैं। हम सभी भूखे हैं। कृपया हमें कुछ भोजन दे दीजिए।’
किन्तु वे ब्राह्मण अपने यज्ञ, मंत्रोच्चार और कर्मकांड में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने ग्वालबालों की बात पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने भोजन देने से इनकार कर दिया।
जब ग्वालबाल वापस लौटे, तो श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले, ‘अब उनकी पत्नियों के पास जाओ।’
ब्राह्मणों की पत्नियाँ पहले से ही भगवान श्री कृष्ण की महिमा सुन चुकी थीं। जैसे ही उन्हें पता चला कि श्री कृष्ण पास में हैं, वे अत्यंत प्रसन्न हो गईं। उन्होंने स्वादिष्ट व्यंजनों से भरे अनेक पात्र उठाए और बिना किसी संकोच के भगवान श्री कृष्ण के दर्शन के लिए दौड़ पड़ीं।
जब वे भगवान के पास पहुँचीं, तो उन्होंने प्रेम और श्रद्धा से भोजन अर्पित किया। श्री कृष्ण ने उनका स्नेहपूर्वक स्वागत किया और उनकी निष्कपट भक्ति की सराहना की।
कुछ समय बाद श्री कृष्ण ने उनसे कहा, ‘अब अपने घर लौट जाओ। तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।’
जब वे वापस लौटीं, तब उनके पतियों को अपनी भूल का एहसास हुआ।
