▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक कछुआ भगवान श्रीविष्णु का अनन्य भक्त था। एक बार गंगासागर स्नान के लिए आए कुछ ऋषियों से उसने श्रीहरि के चरणों की महिमा सुनी। उसके मन में प्रभु के चरणों के दर्शन की तीव्र इच्छा जाग उठी।
उसने ऋषियों से पूछा, ‘प्रभु के दर्शन कैसे हो सकते हैं?’ ऋषियों ने कहा, ‘प्रभु के चरणों का दर्शन उसी पुण्यात्मा को मिलता है, जिस पर उनकी कृपा होती है। यद्यपि वे सर्वव्यापी हैं, फिर भी उनका दिव्य धाम बैकुंठ है, जहाँ वे क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान रहते हैं।’
कछुआ अपनी धीमी गति से प्रभु के धाम की ओर चल पड़ा। लंबी और कठिन यात्रा के बाद वह क्षीरसागर पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि भगवान श्रीविष्णु शेषशय्या पर विराजमान हैं और माता लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा कर रही हैं।
भावविभोर होकर उसने प्रभु के चरण स्पर्श करने का प्रयास किया, किंतु शेषजी और माता लक्ष्मी ने उसे रोक दिया। कछुए का मन व्यथित हो गया। यह सब देखकर भी श्रीहरि केवल मुस्कुराते रहे। देवर्षि नारद भी सोचने लगे कि प्रभु ने अपने भक्त के साथ ऐसा क्यों होने दिया।
समय बीता और त्रेता युग में वही कछुआ केवट के रूप में जन्मा। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ गंगा तट पर पहुँचे, तब केवट ने पहले प्रभु के चरण धोने का आग्रह किया। अंततः उसे अपने हाथों से श्रीराम के चरण पखारने का दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ।
द्वापर युग में वही भक्त सुदामा के रूप में जन्मा। जब वे श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे, तब उनके पैर धूल, कीचड़ और काँटों से घायल थे। श्रीकृष्ण ने स्वयं प्रेमपूर्वक सुदामा के चरण धोए। माता रुक्मिणी सेवा में उपस्थित रहीं और बलराम इस दिव्य मिलन को भावुक होकर देखते रहे।
हरि अनंत, हरि कथा अनंता।
सच्चे भक्त की भावना भगवान कभी व्यर्थ नहीं जाने देते। उचित समय आने पर वे उसकी प्रत्येक इच्छा को अपनी कृपा से पूर्ण कर देते हैं।
