▪️ मुंबई
भारत के चंद्र मिशन चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के रहस्यों को समझने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसे ठोस प्रमाण जुटाए हैं, जिनसे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की मिट्टी और 44 वर्ष पहले अंटार्कटिका में मिले पहले ज्ञात चंद्र उल्कापिंड के बीच सीधा संबंध स्थापित हुआ है। इस खोज को चंद्र विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी सफलता माना जा रहा है।

https://www.isro.gov.in/Ch3_Alpha_Particle_X-ray_Spectrometer.html
वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्ष 1982 में अंटार्कटिका से प्राप्त ALHA81005 नामक चंद्र उल्कापिंड की रासायनिक और खनिज संरचना का अध्ययन किया गया। इसकी तुलना चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर द्वारा दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में जुटाए गए आंकड़ों से की गई। विश्लेषण में दोनों की संरचना में उल्लेखनीय समानता सामने आई, जिससे यह संकेत मिला कि यह उल्कापिंड संभवतः चंद्रमा के उसी उच्च भूभाग से आया था, जहां चंद्रयान-3 ने सफलतापूर्वक अध्ययन किया।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब वैज्ञानिक बिना चंद्रमा से नमूने पृथ्वी पर लाए भी वहां की भूगर्भीय संरचना और विकासक्रम को अधिक सटीकता से समझ सकेंगे। इससे भविष्य के चंद्र अभियानों और संभावित मानव मिशनों की वैज्ञानिक योजना बनाने में भी मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि चंद्रयान-3 के आंकड़ों ने न केवल चंद्र उल्कापिंडों की उत्पत्ति की पुष्टि को मजबूती दी है, बल्कि यह भी सिद्ध किया है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम वैश्विक वैज्ञानिक अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यह खोज चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की भूगर्भीय बनावट और उसके अरबों वर्षों के इतिहास को समझने की दिशा में एक नया अध्याय खोलती है।
