▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक गाँव में भागवत कथा के समापन पर पंडित जी दान-दक्षिणा लेकर लौट रहे थे। तभी गाँव के सरल और गरीब किसान धन्ना जाट ने उनके चरण पकड़कर कहा, ‘महाराज! आपने बताया कि ठाकुरजी की सेवा करने से जीवन सफल हो जाता है। मेरे पास ठाकुरजी नहीं हैं, कृपया मुझे भी दे दीजिए।’
जल्दी में पंडित जी ने अपना भांग घोटने का सिलबट्टा उसे देते हुए कहा, ‘इन्हें ही ठाकुरजी मानकर सेवा करना। पहले स्नान करना, फिर इन्हें स्नान कराकर भोग लगाना और उसके बाद स्वयं भोजन करना।’
धन्ना ने पूरी श्रद्धा से सिलबट्टे को ठाकुरजी मानकर घर में स्थापित कर दिया। वह प्रतिदिन बाजरे का एक टिक्कड़ और मिर्च की चटनी भोग में रखता, पर जब तक ठाकुरजी भोग नहीं लगाते, स्वयं भी भोजन नहीं करता। छह दिन तक वह भूखा रहा, फिर भी उसकी आस्था नहीं डगमगाई।
सातवें दिन वह रो पड़ा और बोला, ‘यदि आप मेरी रोटी भी स्वीकार नहीं करेंगे, तो मेरे जीने का क्या अर्थ है?’ इतना कहकर वह अपना सिर सिलबट्टे पर फोड़ने को तैयार हुआ। तभी दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और स्वयं ठाकुरजी ने उसका हाथ पकड़ लिया। वे प्रेम से उसका भोग स्वीकार करने लगे।
धन्ना ने कहा, ‘प्रभु! आधी रोटी मेरे लिए भी छोड़ दीजिए।’ उसकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु ने उसके जीवन का अभाव दूर कर दिया। समय के साथ उसकी खेती, पशुधन और समृद्धि बढ़ती गई।
कुछ वर्षों बाद पंडित जी फिर गाँव आए। धन्ना ने बताया कि ठाकुरजी आज भी उसके साथ खेत में काम करते हैं।
जब पंडित जी ने दर्शन की इच्छा जताई, तब प्रभु ने कहा, ‘मैं केवल उसी के साथ रहता हूँ, जो निष्कपट प्रेम और सच्ची श्रद्धा से मुझे याद करता है।’
▪️ संदेश: भगवान बाहरी आडंबर से नहीं, निष्कलुष श्रद्धा, सच्चे प्रेम और कर्मनिष्ठ भक्ति से प्रसन्न होते हैं।
