▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

भगवान जगन्नाथ की कथा केवल एक मंदिर या रथयात्रा का इतिहास नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के अनंत प्रेम, भक्ति और करुणा का दिव्य संदेश है।
मान्यता है कि एक बार भगवान श्रीकृष्ण निद्रा में ‘राधे’ नाम का उच्चारण कर रहे थे। यह देखकर उनकी रानियों के मन में ब्रज की उन अलौकिक लीलाओं को जानने की उत्सुकता जागी। माता रोहिणी ने जब ब्रज-प्रेम की कथा सुनानी आरंभ की, तब श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा भी उस रस में ऐसे डूब गए कि प्रेम-विभोर होकर उनके अंग सिकुड़ गए। यही दिव्य भाव आगे चलकर जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के अद्वितीय स्वरूप का आधार बना।
कलियुग में राजा इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में प्रभु का आदेश मिला कि वे नीलांचल में एक भव्य मंदिर का निर्माण करें। अनेक दिव्य घटनाओं, भीलराज विश्वावसु, उनकी पुत्री ललिता और विद्वान विद्यापति के माध्यम से भगवान के पावन विग्रह का रहस्य प्रकट हुआ। अंततः समुद्र से प्राप्त दिव्य काष्ठ पर स्वयं विश्वकर्मा वृद्ध शिल्पी का रूप धारण कर प्रतिमाओं का निर्माण करने लगे। किंतु निर्धारित समय से पहले द्वार खुल जाने के कारण प्रतिमाएं अधूरी रह गईं। भगवान की यही अलौकिक, अपूर्ण प्रतीत होने वाली प्रतिमाएं आज श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रूप में जगत की श्रद्धा का केंद्र हैं।
पुरी की रथयात्रा भी इसी दिव्य प्रेम की स्मृति है। इसमें भगवान अपने भाई-बहन के साथ रथ पर विराजकर भक्तों के बीच आते हैं और यह संदेश देते हैं कि ईश्वर केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि अपने भक्तों के घर-आंगन और हृदय में भी निवास करते हैं।
महाप्रभु जगन्नाथ की भक्ति हमें प्रेम, समानता, सेवा और पूर्ण समर्पण का मार्ग दिखाती है। जो भक्त निष्कपट भाव से उन्हें स्मरण करता है, उसके जीवन में आशा, शांति और कृपा का प्रकाश अवश्य उतरता है। यही जगन्नाथ महाप्रभु की सनातन महिमा है।
