▪️सूर्यकांत उपाध्याय

सुबह का समय था। मंदिर में मंगल आरती के बाद भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर रहे थे। उन्हीं में एक वृद्ध माताजी भी प्रतिदिन आती थीं।
उनकी एक अनोखी आदत थी। वे अपने आँचल से बड़ा-सा कटहल निकालकर भगवान को दिखातीं और मुस्कुराकर कहतीं, ‘प्रभु, देखिए मेरे बगीचे का कितना मीठा कटहल है। इसे मैं अपने परिवार को खिलाऊँगी, आप तो यहीं मंदिर में बैठे रहिए।’ इतना कहकर वे हँसते हुए चली जातीं। भगवान मन ही मन सोचते, ‘रोज दिखाती हैं, पर एक टुकड़ा भी नहीं देतीं।’
एक दिन भगवान ने अपने प्रिय सखा बलराम दास से कहा, ‘आज रात उस बगीचे में चलेंगे। मेरा भी मन उस कटहल का स्वाद चखने का है।’
रात को दोनों चुपचाप बगीचे पहुँचे। भगवान पेड़ पर चढ़े और सबसे बड़ा कटहल तोड़कर नीचे फेंका, लेकिन वह सीधे बलराम के सिर पर जा गिरा। दोनों हँस पड़े और वहीं बैठकर प्रेम से कटहल खाने लगे। कटहल खाते-खाते बलराम को नींद आ गई। भगवान उन्हें जगाकर मंदिर लौट गए।
सुबह माताजी ने बगीचे में आधा खाया हुआ कटहल और सोते हुए बलराम को देखा। उन्हें चोर समझकर डाँटते हुए घर पहुँचा दिया।
अगले दिन भगवान ने हँसते हुए बलराम को फिर साथ चलने के लिए मना लिया। रात में जैसे ही दोनों फिर कटहल तोड़ने लगे, माताजी बाहर आ गईं। बलराम को तो उन्होंने पहचान लिया, लेकिन दूसरे बालक को देखते ही स्तब्ध रह गईं। वे समझ गईं कि स्वयं भगवान जगन्नाथ उनके घर पधारे हैं।
अगली सुबह माताजी अपने बगीचे के सभी कटहल भगवान को अर्पित करते हुए रो पड़ीं। उन्होंने क्षमा माँगी।
भगवान की मधुर मुस्कान मानो कह रही थी -‘मुझे छप्पन भोग नहीं, भक्त का निष्कपट प्रेम प्रिय है।’ तभी से माताजी हर वर्ष पहला और सबसे मीठा कटहल भगवान जगन्नाथ को अर्पित करने लगीं।
