▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक चाट वाला था। जब भी उसके पास चाट खाने जाओ, तो ऐसा लगता था कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता था। कई बार उससे कहा कि, ‘भाई, देर हो जाती है, जल्दी चाट लगा दिया करो’, लेकिन उसकी बातें खत्म ही नहीं होती थीं।
एक दिन अचानक उसके साथ मेरी कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।
तकदीर और तदबीर की बात सुनकर मैंने सोचा कि चलो, आज उसकी फिलॉसफी देख ही लेते हैं। मैंने उससे एक सवाल पूछ लिया। मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?
उसने जो जवाब दिया, उसे सुनकर मेरे दिमाग के सारे जाले ही साफ हो गए।
वह चाट वाला मुझसे कहने लगा, ‘आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?’
मैंने कहा, ‘हाँ।’
तब उस चाट वाले ने मुझसे कहा, ‘उस लॉकर की चाबियाँ ही आपके सवाल का जवाब हैं। हर लॉकर की दो चाबियाँ होती हैं। एक आपके पास होती है और दूसरी मैनेजर के पास। आपके पास जो चाबी है, वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली चाबी है भाग्य की।’
वह आगे बोला, ‘जब तक दोनों चाबियाँ नहीं लगतीं, लॉकर का ताला नहीं खुल सकता। आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान! आपको अपनी चाबी भी लगाते रहना चाहिए। पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाबी लगा दे। कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्य वाली चाबी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाबी न लगा पाएं, और ताला खुलने से रह जाए।’
शिक्षा: कर्म करते रहिए। भाग्य के भरोसे रहकर अपने लक्ष्य से दूर मत होइए। कर्म करते रहेंगे, तो भाग्य को भी आपका साथ देना ही पड़ेगा।
