▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक दिन मेरे पुराने मित्र भगीरथभाई कई वर्षों बाद मिलने आए। बातचीत के बाद वे मुझे खरीदारी के लिए साथ ले गए। वर्षों पहले वे छोटी-छोटी बातों पर दुकानदारों से उलझ जाते थे, इसलिए मुझे आश्चर्य हुआ जब इस बार उन्होंने एक दुकानदार की गलती पर भी शांत स्वर में कहा, ‘दोस्त, शायद आपसे गलती हो गई है। मैंने ऊपर रखे थान में से कपड़ा चुना था। कृपया उसी में से काट दीजिए।’
मैंने हैरानी से उनके बदलाव का कारण पूछा। वे मुस्कुराए और बोले, ‘अशोक ने मुझे सिखाया कि सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है।’
उन्होंने बताया कि अशोक उनका बेहद करीबी मित्र था। उनकी बहन की शादी की सारी जिम्मेदारी अशोक और उसकी पत्नी सुमित्रा ने संभाली थी। शादी से एक दिन पहले रात तक दोनों तैयारियों में लगे रहे और अगले दिन सुबह साढ़े सात बजे विवाह स्थल पर आने का वादा किया।
लेकिन वे नहीं आए।
अपने पुराने स्वभाव के अनुसार भगीरथभाई गुस्से से भर उठे। उन्होंने अशोक को गैर-जिम्मेदार तक कह दिया। शाम को रिसेप्शन में अशोक की ओर से साड़ी, ₹151 का शगुन और शुभकामना पत्र आया। गुस्से में उन्होंने सब ठुकरा दिया और पत्र फाड़ दिया।
करीब पंद्रह दिन बाद बहन की जिद पर वे अशोक के घर गए। वहां सुमित्रा ने नई साड़ी पहनकर उनका स्वागत किया। भगीरथभाई को कुछ अजीब लगा। उनकी पत्नी ने सुमित्रा से सच पूछा तो वह फूट-फूटकर रो पड़ीं।
सच्चाई यह थी कि शादी वाले दिन सुबह छह बजे अशोक को दिल का दौरा पड़ा था और डॉक्टर के पहुंचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई थी।
सुमित्रा ने पंद्रह दिन तक किसी को यह खबर नहीं दी, ताकि बहन की शादी की खुशियों पर शोक की छाया न पड़े। यहां तक कि अपने पति की अंतिम यात्रा की तैयारी के बीच भी उन्होंने बहन के लिए साड़ी, शगुन और शुभकामना संदेश भेजा।
यह सुनकर भगीरथभाई भीतर तक टूट गए। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि बिना पूरी सच्चाई जाने किसी को दोष देना कितना बड़ा अन्याय है।
- सीख: हम अक्सर अधूरी जानकारी के आधार पर लोगों के बारे में राय बना लेते हैं। हर घटना के पीछे एक ऐसी सच्चाई हो सकती है, जिससे हम अनजान हों।
