
▪️मुंबई
हिंदुस्तानी गजल फाउंडेशन की ओर से आयोजित साहित्यिक एवं गजल कार्यक्रम ‘हिंदुस्तानी ग़ज़ल… यानी’ का आयोजन गत शनिवार मुंबई के भवन्स ऑडिटोरियम में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार नंदलाल पाठक ने की। देश के विभिन्न शहरों से आए प्रख्यात ग़ज़लकारों ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और पूरा सभागार गजलों की भावनात्मक एवं साहित्यिक सरिता में डूबा नजर आया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में अमरजीत मिश्र, डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय और सुभाष काबरा उपस्थित रहे। दिल्ली से आए प्रसिद्ध गजलकार दीक्षित दनकौरी ने अपनी ग़ज़लों की प्रभावशाली प्रस्तुति से विशेष छाप छोड़ी। उन्होंने सुनाया- ‘ये गजल पास आ गुनगुना लूँ तुझे। तू सँवारे मुझे, मैं सँवारूँ तुझे।’

कार्यक्रम में अलका ‘शरर’, मोनिका सिंह, विशाल बाग, अमर त्रिपाठी, ज़ीशान साहिर तथा हिंदुस्तानी ग़ज़ल फाउंडेशन के संस्थापक और आयोजक संतोष सिंह ने भी अपनी गजलों का पाठ किया।
मोनिका सिंह ने रिश्तों और स्मृतियों की भावनाओं को स्वर देते हुए कहा-‘एक पल गुज़रा नहीं जिसके सिवा
दूर वो मुझसे हुआ मेरे सिवा।’
विशाल बाग ने अपनी प्रस्तुति में कहा- ‘मेरे आने में देरी का कारण है,
मैं बिल्कुल सीधे रास्ते से आया हूँ।’ अलका ‘शरर’ की पंक्तियों ने जीवन के संघर्ष और संतुलन का संदेश दिया-‘जीतना ही नहीं काफ़ी मुझे जीने के लिए, कब कहाँ हारना है, ये भी सलीक़ा है मुझे।’
ज़ीशान साहिर ने सामाजिक सरोकारों को अपनी ग़ज़ल में अभिव्यक्त करते हुए कहा-‘जो दुनिया भर को भिक्षा दे रहा है,
वही अग्नि परीक्षा दे रहा है।’

कार्यक्रम के संचालक रवि यादव ने भी अपनी रचनाओं से श्रोताओं की खूब सराहना बटोरी। उन्होंने कहा- ‘ज़िंदगी फिर से सँभाली जाएगी, बात हर बिगड़ी बना ली जाएगी।’
संतोष सिंह ने अपनी गजल के माध्यम से सवाल, उम्मीद और रोशनी की भावनाओं को अभिव्यक्त किया-‘सवाल मुझसे है, मुझको जवाब देना है, हुज़ूर, आपको थोड़ी हिसाब देना है।’

वहीं अमर त्रिपाठी ने पिता के स्नेह को शब्द देते हुए सुनाया- ‘पिता के दिल में रहती प्रीत पहचानी नहीं जाती, बड़े हो जाएँ बच्चे, फिर भी निगरानी नहीं जाती।’
कार्यक्रम का संचालन रवि यादव ने किया।
