▪️सूर्यकांत उपाध्याय

रामायण केवल धर्म और मर्यादा की कथा नहीं बल्कि प्रेम, कर्तव्य और त्याग की अनुपम शिक्षा भी देती है। जब भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास मिला, माता सीता ने उनके साथ वन जाने का निर्णय लिया। लक्ष्मण भी भाई की सेवा के लिए वन जाने को तैयार हो गए। लेकिन उनके मन में सबसे बड़ा संकोच पत्नी उर्मिला को लेकर था।
कहा जाता है कि लक्ष्मण जब उर्मिला के कक्ष में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उर्मिला आरती का थाल लिए खड़ी थीं। लक्ष्मण कुछ कहते, उससे पहले ही उर्मिला ने उनके मन की बात समझ ली। उन्होंने कहा कि वे बिना किसी चिंता के राम और सीता की सेवा के लिए वन जाएं। उन्होंने अपने सुख की नहीं, लक्ष्मण के कर्तव्य की चिंता की।
लक्ष्मण 14 वर्षों तक वन में राम की सेवा में जागते रहे। वहीं उर्मिला ने अयोध्या में रहकर मौन तपस्या की। लोककथाओं में उनका यह त्याग इस रूप में वर्णित है कि उन्होंने लक्ष्मण के संकल्प और सेवा में कभी बाधा नहीं बनने दी।
जब युद्ध में लक्ष्मण मूर्छित हुए और हनुमान संजीवनी लेने निकले, तब उर्मिला की अटूट आस्था का प्रसंग भी सामने आता है। उनके लिए लक्ष्मण का जीवन केवल उनका अपना नहीं था। उनकी हर सांस में राम थे और राम की सेवा ही उनके जीवन का उद्देश्य।
उर्मिला की कथा हमें बताती है कि त्याग हमेशा दिखाई नहीं देता। कुछ त्याग रणभूमि में होते हैं और कुछ महलों के भीतर मौन रहकर। राम, सीता और लक्ष्मण का त्याग जितना महान है, उतना ही उर्मिला का मौन समर्पण भी।
रामराज्य केवल सत्ता या व्यवस्था से नहीं बल्कि प्रेम, कर्तव्य, त्याग और समर्पण की उस भावना से स्थापित हुआ, जिसकी आधारशिला इन महान चरित्रों ने रखी। उर्मिला इसी मौन त्याग की प्रतीक हैं।
